शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010

जब हुआ नाड़ी निरीक्षण

त 17 फरवरी से योग शिविर जा रहा हूँ, एक दोस्त के निवेदन पर, ताकि दोस्ती भी रह जाए और सेहत में भी सुधार हो जाए। योग शिविर में जाकर बहुत मजा आ रहा है, क्योंकि वहाँ पर बच्चा बनने की आजादी है, जोर जोर से हँसने की आजादी है, वहाँ पर बंदर उछल कूद करने की आजादी है। सुना तो बहुत बार है कि मानव रूपी पुतला पाँच तत्व से बना है,
लेकिन उसको भी तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है, पहली बार जानने को मिला। वहाँ जाकर पता लगा कि मनुष्य में तीन प्रकार की प्रकृति पाई जाती हैं कफ, पित्त और वात। एक महिला प्रवक्ता ने इस पर थोड़ी जानकारी दी, उसको सुनने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं पित्त प्रकृति का व्यक्ति हूँ, जो जो लक्षण उन्होंने बताए वो मैंने खुद में महसूस किए, लेकिन मेरी स्वीकारने की भावना मेरे दोस्त को खनक गई। उसने कहा कि नाड़ी निरीक्षण करवा, मुझे लगता है तुम्हारी प्रकृति कफ है। तो मैंने कहा, नहीं यार जो लक्षण बताएं हैं वो तो मेरे भीतर हैं। वो माना नहीं, और मैं भी ठहरा जिद्द का पक्का। शुक्रवार को जैसे ही योग शिविर की समाप्ति हुई, तो पहुंच गया वहाँ मौजूद डॉक्टरनी साहिब से नाड़ी निरीक्षण करवाने। कुर्सी पर बैठते हुए आँखें बंद करने से पहले मैंने बाईं बाजू आगे कर दी, क्योंकि मुझसे पहले नाड़ी निरीक्षण करवा रही महिला ने भी उसी बाजू को आगे किया था। मेरी बाईं बाजू को देखकर डॉक्टरनी साहिबा बोली, दूसरी बाजू आगे करो। मैं मन ही मन में हँस रहा था, बहुत पुरानी बात को याद कर, एक बार पहले भी किसी हस्तरेखा माहिर ने मुझे ऐसा ही कहा था कि दूसरी बाजू आगे करो। मैंने दाईं बाजू आगे कर दी। डॉक्टरनी साहिबा ने मेरी कलाई के आसपास की नसों को दबा दबा कर कुछ महसूस करने की कोशिश की, तब मैं बंद आँखों के सामने हिरन, खिलते हुए फूल और पहाड़ों से गिरता पानी महसूस कर रहा था। उस सुंदर नजारे के साथ साथ मुझे समझ भी आ रहा था कि  डॉक्टरनी साहिबा के कुछ पल्ले नहीं पड़ा रहा,  मेरा सोचना शुरू ही था कि उन्होंने थोड़ी  देर बाद मेरी दाईं बाजू को छोड़ दिया और बोली कि  दूसरी बाजू को आगे करो।  मैंने फिर बाईं बाजू आगे बढ़ा दी, जिसको उन्होंने नकार दिया था। फिर थोड़ी देर तक निरीक्षण चला और अंतिम में डॉक्टरनी साहिबा बोली। जहाँ तक मुझे लगता है तुम पित्त प्रकृति के हो, मतलब दोनों बाजू देखने के बाद भी केवल उसको लगा। पक्की गारंटी नहीं दे सकी कि मैं पित्त प्रकृति का हूँ, मुझे क्या करना था वो सब जानकर, मैं जो हूँ, वो मैं अच्छी तरह जानता हूँ, लेकिन दोस्त के व्याकुल मन को संतुष्ट करना था मुझे तो। दोस्त भी बड़ा अजीब है, वो फिर भी मानने को तैयार नहीं हुआ, वो बोला तुम कफ प्रकृति के हो। दोस्त को ही शांति देनी थी, तो मैंने कह दिया दोनों प्राकृतियों का हूँ। जब घर पहुंचा तो सोचा। दोस्त कहता है कफ प्रकृति हूँ, डॉक्टरनी साहिबा कहती हैं कि पित्त प्रकृति का हूँ। मतलब अब एक प्रकृति बची है वात, लगते हाथ उसको भी ग्रहन करन लेता हूँ। डॉक्टरनी साहिबा की जाँच देखकर दोस्त भी घबरा गया था, जो घबराहट मैंने महसूस की उसके दिल में, क्योंकि डॉक्टरनी साहिबा सबको एक ही बाजू चैक करके बता देती थी, लेकिन पहला व्यक्ति था, जिसकी दोनों बाजूओं को चैक करना पड़ा।

9 टिप्‍पणियां:

अन्तर सोहिल ने कहा…

रोचक घटना है :-)

वैसे आपको दोस्त की बात ही माननी चाहिये। क्या फर्क पडता है, कफ हो या पित्त प्रकृति
दोस्त खुश रहना चाहिये जी

प्रणाम

Udan Tashtari ने कहा…

अलग अलग प्रवृति वालों के लिए अलग अलग योग आसन हैं क्या?

शरद कोकास ने कहा…

दिन भर मे अलग अल्ग प्रकृति जोर मारे तो क्या अलग अलग चेक करवाना होगा ? मेरी तरफ से यह सवाल पूछना भाई ।

निर्मला कपिला ने कहा…

रोचक संस्मरण है । आशीर्वाद ।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

आपको होली की रंग भरी शुभकामनाएँ !

Manish ने कहा…

main bhi jaana chahta hoon... :) :)

L.R.Gandhi ने कहा…

नाड़ी जांचना आयुर्विज्ञान का प्रथम ज्ञान है। अब किसी को जांचना ही ना आए तो बात अलग है। वाट, पित्त ,कफ़ तीन
प्रक्रित्यां तो हैं ही, इनमें भी वात-पित्त ,वात-कफ़ ,पित्त -वात , pit-कफ़ ,कफ़-वात, और कफ़-पित प्रधान प्रकृतियाँ भी होती हैं। लुकमान हकीम तो शक्ल देख कर ही रोग बता देते थे ...खैर अब तो आयुर्वेद कि पढाई महज़ डाक्टर बनने-(एलोपथिक प्रक्टिस )के लिए ही कि जाती है।

somyaa ने कहा…

aapka blog me ek alag hi energy hi , bindaas attitude aur patrakaar ka josh saaf jhalakta hai...
ye kissa padhkar achha laga :)

kshama ने कहा…

Chaliye,aap bach gaye, warna apni nakami chhupane ke liye kuchh ulta seedh bhi bata de sakti thee..!