सोमवार, फ़रवरी 15, 2010

जो हूँ वैसा रहना

मैं कल से क्यों नहीं डरता? मैं कल के बारे में क्यों नहीं सोचता? मेरी पत्नि अक्सर मुझ पर चिल्लाती है| चिल्लाए भी क्यों न वो, कल से जो डरती है, जिसके चक्कर में वो आज भी खो बैठती है। मुझे नहीं पता चला कब और कैसे मुझे आज से नहीं अब से प्यार हो गया। जो हूँ वैसा रहना मुझे पसंद है, चाहे सामने वाले को कितना ही बुरा क्यों न लगे। मुझे पल पल रूप बदलना नहीं आता। मैंने कहीं सुनना था या पढ़ा था सच और तलवार का घाव जल्द ठीक हो जाता है। उसके बाद झूठ का पल्लू पकड़ना बंद कर दिया, जबकि दुनियादारी झूठ के बगैर चलती नहीं।
पता नहीं कौन सी शक्ति है मेरे पीछे, जो मेरी दुनियादारी को सच के बलबबूते पर भी चलाए जा रही है। मैं कभी किसी चीज के पीछे दौड़ा नहीं, जो चाहिए वो सामने अचानक आ खड़ा हुआ और मुझे शक्ति देकर गायब हो गया या कह लो मुझमें समा गया। पिछले साल रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म थ्री इड्टियस तो सबने देखी हो गई। सच में मैं मेरा सीना तब गर्व से फूल गया था, शरीर के भीतर एक अनोखी शक्ति महसूस की। जब इंटरव्यू देना आया रोस्तगी कहता है कि दो टाँग तुड़वाकर फिर से चलना सीखा हूँ, ये एटीट्यूट तो आते आते ही आएगा। मुझे पता है वो फिल्म थी, पर्दे पर ऐसा तो दिखाया जा सकता है, लेकिन मैंने तो इस असल जिन्दगी में अपना हुआ है अब से नहीं, तब से जब एक खेत छीनने पर पिता ने कहा था " कोई बात नहीं, बेटा खेत छीना है, कर्म तो नहीं"। उस दिन के बाद शायद कोई पल होगा जब मैंने कभी कहीं काम छूटने को लेकर अफसोस किया हो। मुझे याद है जब मैंने दैनिक जागरण छोड़ा था। मैंने एकाएक ही दैनिक जागरण को त्याग पत्र दे दिया, और बाहर निकल गया उस संस्थान से। सच में ऑफिस से पहले सीधा घर ही जाना था, घरवालों को बताना जो था कि बेटे ने नौकरी को ठोकर मार दी। सीढ़ियाँ उतर रहा था कि मोबाइल पर रिंग आई। बोले हैप्पी कहाँ हो? पंजाबी केसरी के लिए काम करोगे? उन्होंने कहा पैसे कितने लोगे? मैंने कहा, पैसे के लिए जॉब करनी होती तो दैनिक जागरण को ठोकर क्यों मारता, जो एक ही झटके में दो हजार रुपए बढ़ने के तैयार हो गया था। पंजाब केसरी में जॉब मिल गई और मैं खुश। डेढ़ साल बाद कुछ रिश्तों में खटास आने लगी। रिश्तों में खटास मुझे पसंद नहीं। जॉब छोड़ना बेहतर समझा, अच्छे रिश्ते रह जाएं इसलिए। जॉब छोड़ते ही फिर नई जॉब का ऑफर आ गया। फिर घर रहने की फुर्सत न मिली, स्वाभाव कभी नहीं बदला। चापलूसी हम से होती नहीं। कई जगहों से गुजरने के बाद वेबदुनिया ग्रुप में पहुंचा हूँ, यहाँ भी अपना स्वाभाव बरकरार है। जैसा हूँ वैसा रहना पसंद है। पिता की उस बात ने जिन्दगी को जीने का तरीका दे दिया। वरना मैं भी कल के चक्कर में अपना आज खो रहा होता। बहुत कुछ मिला है बिन माँगे।

शायद चाहने वालों ने
एक जमाने बाद
खुशियाँ को मेरे घर का पता दे दिया।

11 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया है. अपने स्वभाव पर अडिग रहिये..शुभकामनाएँ.

L.R.Gandhi ने कहा…

सभी प्राणी जन्म से ही अपने साथ एक गुण लेकर पैदा होते हैं, वह है प्रकृति अर्थात सवभाव , यह उसके पूर्व जन्मों का प्रतिफल है। वर्तमान में जो जीते हैं भाग्य उनका साथ देता ही है। ॥ अति-उत्तम।

Mithilesh dubey ने कहा…

सही है भाई जैसा हूँ बढिया हूँ , यही सिद्धान्त सबसे बढिया लगता है ।

संगीता पुरी ने कहा…

जो धरातल पर खडा होता है .. उसे गिरने का डर नहीं होता .. ऊंचाई में रहनेवाले ही सशंकित रहा करते हैं .. अपने कर्म के अनुसार फल मिलता रहे .. जीवन में और क्‍या चाहिए ??

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मजबूती से खडे रहिये, कोई हिला भी नहीं पायेगा. सुन्दर पोस्ट.

देवेश प्रताप ने कहा…

कुलवंत जी .....सच की ताकत आपके साथ है , सलूट करता हू आपको .

vikas ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
vikas ने कहा…

bahut achhi abiwaykat,esa is liye hota hai ki aap aapni jagah sahi rahte ho,ese hi rahiyrga wo shakti hamesha aapke saath rahegi.

VIKAS PANDEY
http://vicharokadarpan.blogspot.com/

अन्तर सोहिल ने कहा…

आपने स्वभाव में ही स्थित रहना ही धर्म है, यही सफलता है।
अच्छा लगा आपको पढकर
अब लगातार पढूंगां, आप भी लिखते रहियेगा।

प्रणाम स्वीकार करें

शरद कोकास ने कहा…

केवल वर्तमान मे जीना उचित नही है

kshama ने कहा…

ताल-तलैया पी कर जागा
नदी मिली सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरूथल तक भागा

क्यों खुद को ही, रोज छले रे
तू है कौन, कौन हैं तेरे
Gazabki rachana hai!