शुक्रवार, मई 07, 2010

लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।

गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। जब गाँव से निकला था, बड़ी मुश्किल से 18 साल का हूँगा। माँ ने रोका था, मत जा शहर अभी तुम बहुत छोटे हो। अभी तुम हमारे साथ यहाँ रहो। शहर में बहुत भीड़ भाड़ है। तुमको अंधेरे से डर लगता है। अभी तुम पढ़ाई करो। नौकरी नाकरी बाद में कर लेना, लेकिन गाँव में रहने के लिए कुछ न था, किसके भरोसे रहता। वो माँ भी जानती थी, लेकिन माँ तो आखिर माँ होती है। वो कैसे अपने जिगर के टुकड़े को कुछ कागज के टुकड़ों के लिए आँखों से ओझल कर दे। गाँव छोड़ने के बाद मेरी स्थिति शादी कर चली गई लड़की जैसी हो गई, जो ससुराल में इतनी व्यस्त हो गई कि मायके में बस कभी कभार कुछ पलों के लिए ही आना होता है। माँ की दवाई लेकर जाना, गाँव जाने का एक मात्र बहाना हो गया था, इसके अलावा कुछ नहीं। बस माँ के दर्शन किए, दवाई थमाई, और हालचाल पूछा नहीं कि बस ने गाँव के दूसरे बस स्टेंड से हॉर्न बजा दिया, जैसे कह रही हो प्लीज हरी! अप। जो माँ मेरे लिए बनाती वो घर में बहन के लिए ही छूट जाता, वो बीमार थी, लेकिन बेटे के आने की बात सुनते ही तंदरुस्त हो उठी, पता नहीं क्या ऊर्जा थी बेटे के आने की खबर में, और मैं भागती जिन्दगी में सोच ही नहीं पाया कि जिन्दगी हमारी मुट्ठी में भरी रेत की तरह कण कण होकर फिसल रही है। जिन्दगी एक सफर है, इसको कहीं न कहीं तो खत्म होना है, शायद किसी का पहले और किसी का बाद में। माँ बीमार थी, लेकिन फिर भी जब मैं शहर से फोन लगाता तो माँ सबसे पहले मेरा हाल पूछती, जबकि हाल तो मुझे पूछना होता था उसका। उस समय मेरे घर में एक भी फोन नहीं थी, लेकिन आज वो नहीं तो घर में तीन तीन फोन हैं, घर का अलग, भाई का अलग और पिता का। वो दंग रह जाती जब मैं उसको बताता कि मैं ऑफिस में से बहुत देर रात निकलता हूँ घर के लिए, क्योंकि वो जानती थी मैं अंधेरे से बहुत डरता था, इतना कि पेशाब करने के लिए भी रात को रोशनी से परे एक कदम भी नहीं उठाता था। फिर पूछती खाना पीना तो अच्छा है, हाँ तेरी मौसी बता रही थी कि तुम दिन में एक बार खाना खाने लग गए हो, तो मैं कहता नहीं नहीं बाज़ार से कुछ खा लेता हूँ। कैसे कहता कि माँ मुझे रोटियाँ अच्छी नहीं लगती। गाँव में दिन की 27 रोटियाँ तोड़ने वाला शहर की भाग दौड़ में सिर्फ पाँच छ: रोटियों पर आ गया है। उसको कैसे बताऊं कि शहर आकर जाना है मैंने रोटियाँ गिनकर बनाई जाती हैं, तेरी तरह नहीं कि रोटियों से छाबा (रोटियाँ रखने वाला स्तूत की लड़की से बना डिब्बा) भरकर रख दो, जब चाहे मेरे बच्चों का मन करे खा लें। बेटे से दूर गाँव में रहना अब मुश्किल हो रहा था, शायद इसलिए एक दिन उसने फैसला किया कि अब वो शहर रहेगी, शहर की फिजाओं को माँ का फैसला ठीक न लगा, और जिस सुबह माँ ने फैसला लिया, उसी दिन की शाम वो सदा के लिए अलविदा कहकर चली गई। जाना तो सब को है, लेकिन अच्छे लोगों के साथ समय कुछ ज्यादा ही गुजारने को मन करता है। माँ के जाने के बाद सब शहर आ गए, लेकिन मैं कमबख्त फिर शहर छोड़ आया, मुझे याद है, एक बार एक पंडित ने कहा था, इस लड़के के नसीब में घर में रहना लिखा ही नहीं। पंडित की बात बेघर होना, उस घर तक ही सीमित थी, या मेरे नए बसे घर पर भी लागू होती है मुझे नहीं पता, जिसमें मैं, मेरी बिटिया और उसकी माँ रहते हैं।

5 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

माँ बीमार थी, लेकिन फिर भी जब मैं शहर से फोन लगाता तो माँ सबसे पहले मेरा हाल पूछती, जबकि हाल तो मुझे पूछना होता था उसका। उस समय मेरे घर में एक भी फोन नहीं थी, लेकिन आज वो नहीं तो घर में तीन तीन फोन हैं, घर का अलग, भाई का अलग और पिता का....
....Maa ko apne se jyada khyal apne bachhon ka hota hai tabhi to wah phone se pahle haal chal puchte thi....
Aapne bahut maarmikta se apni vyatha ka bhavpurn chitran kiya.... padhkar sach mein gaon kee yaad aa gayee aur un Maa-Baap ka khyal aaya jo aaj bhi apne desh-pardesh gaye bachhon ke liye roti rahti hain.. aur we hain ki apni duniya mein gum.....
Maa ki Mamtamayee prasuti ke liya bahut bahut abhar

Shekhar Kumawat ने कहा…

kuch assa hi hota he jab ma ki bat hoti he

शरद कोकास ने कहा…

भाई कुलवंत आप्ने जो कुछ भी लिखा है वह पढ़ने से ज़्यादा महसूस करने के लिये है । इस अहसास को वही जान सकता है जिसके भीतर इतनी सम्वेदना है ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

"और मैं भागती जिन्दगी में सोच ही नहीं पाया कि जिन्दगी हमारी मुट्ठी में भरी रेत की तरह कण कण होकर फिसल रही है"

बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी लेख है ...

ashq ने कहा…

I m feeling the heat ......gr8 words wid lots of emotions !!!!