रविवार, जनवरी 03, 2010

इम्तिहानों के दिन और फिल्म चस्का

बचपन गुजर चुका था, और हम किशोर अवस्था से युवास्था की तरफ दिन प्रति दिन कदम बढाते जा रहे थे। ये उन्हीं दिनों की बात है। हम सब दोस्त एक कमरे में बैठकर इम्तिहानों के दिनों में पढ़ाई करते थे। पढ़ाई तो बहाना होती थी सच पूछो तो मौज मस्ती करते थे। कभी दलजिंदर के चौबारे में तो कभी कलविंदर की बैठक में...रोज रात को पढ़ाई के बहाने महफिल जमती थी। वो जट्ट सिख परिवार से संबंध थे और उन सब के बीच मैं एक पंडितों के परिवार से होता था। हम हैं पंडित, लेकिन रहनी सहनी (जीवनशैली) बिल्कुल जट्टों जैसी है। जट्ट परिवार से संबंधित जितने भी दोस्त थे, वो पढ़ने लिखने में तो बिल्कुल नालायक.. उनके मन में एक बात घर कर चुकी थी कि जट्ट पुत्र तो खेतों के लिए बने हुए और उनको डिप्टी कमिश्नर तहसीलदार तो बनना नहीं। मेरा परिवार गरीब था, इसलिए मुझे किसी न किसी तरह पढ़ाई पूरी कर नौकरी हासिल करनी थी। इसलिए उन सब में सबसे ज्यादा नम्बर लाने वाला मैं ही होता था, वो सब के सब नक्लची।


उनको किताबों पर छापे हुए अक्षर तो पहाड़ों जैसे लगते थे, जिन पर फतेह पाना उनके लिए साँप की बिल में हाथ डालने जैसा था। एक रात हम सबको कुलविंदर की बैठक में पढ़ने के लिए जाना पड़ा क्योंकि शनिवार रात को फिल्म आती थी, इसलिए दलजिंदर की माँ बोली "आज तुम कुलविंदर के घर जाओ और वहां पर टीवी नहीं है"। सब चुपचाप कुलविंदर के घर आ गए और पढ़ाई में लग गए। पल्ले तो किसी के कुछ पड़ने वाला नहीं होता था लेकिन फिर भी मजबूरन किताबों के साथ माथा पच्ची करनी पड़ती थी क्योंकि मुझे जो पढ़ना होता था। मैं पढ़ाई करूंगा तो वो कैसे मौज मस्ती कर सकते हैं। मैं मस्ती में पढ़ रहा था...मुझे नहीं पता था कि सब का ध्यान घड़ी की सूईयों की तरफ लगा हुआ है। जैसे ही नौ बीस हुए तो बोले यार फिल्म तो अच्छी आने वाली है और चल देखते हैं।

मैंने सोचा अब कहां से जाएंगे ? उधर, सब सो चुके होंगे और किसका दरवाजा खटखटाएंगे ? तो दलजिंदर बोला भुपिंदर चौबारे में सो रहा है और वो पक्का फिल्म देख रहा होगा। हम बोले वो तो सबको बता देगा और सबको कल सुबह गालियां पड़ेंगी। तो दलजिंदर बोला वो तो देखते देखते टीवी सो जाता और आज भी सो गया होगा पक्का। फिर सवाल आया चौबारे तक पहुंचेंगे कैसे? तो कलविंदर बोला...गुरनाम के घर के साथ लगती दीवार से कूदकर घर से बाहर निकल जाते हैं और टोटी के घर वाली दीवार से होते हुए दलजिंदर के चौबारे तक पहुंच जाएंगे। उधर, मेरा मन डर रहा था कि कहीं किसी ने देख लिया तो कल बेटा काम से गया क्योंकि दीवार के उस पार मेरे घर का दरवाजा बिल्कुल सीधा पड़ता था।

सबके कहने पर पहले दीवार पार की और फिर चोरों की तरह घर की पिछली दीवार से छत तक पहुंचे और धीरे धीरे चौबारे में प्रवेश किया। वहां पर दलजिंदर वाली बात सच हुई, भुपिंदर गाढ़ी नींद में सोया हुआ था और टीवी चल रहा था। हम सबने फिल्म देखी..लेकिन बीच बीच में जब कोई जबर्दस्त सीन आता तो गुरनाम बिंदर की आवाज निकल जाती...इस आवाज ने रात को तो कोई हंगामा खड़ा नहीं किया, लेकिन सुबह मरवा दिया। आवाज दलजिंदर की मम्मी ने सुन ली थी। जब अगली सुबह मैं उनके घर गया तो उसकी मम्मी ने पूछा क्या रात तुम लोग फिल्म देख रहे थे? तो मैंने साफ साफ कह दिया हां देखी थी, पर आपको कैसे पता चला? उन्होंने कहा कि गुरनाम के बोलने की आवाज आ रही थी। इस बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा और मैं वहां से कलटी मार गया। इसके बाद कानों को हाथ लगाए...ऐसा रिस्क नहीं लेना।

अगर और पढ़ने की इच्छा है जी तो : जब यारों के लिए लिखे प्रेम पत्र

9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया रोचक संस्मरण..उन दिनों को याद करके ही आनन्द आ जाता है.

Udan Tashtari ने कहा…

’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

-सादर,
समीर लाल ’समीर’

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वाह ....कुलवंत जी कभी बचपन में पंजाब गयी थी ....कोठे की बात से वे दृश्य याद आ गए .....उस समय मोर बहुत आया करते थे छत पर हम दौड़ कर कितने पंख निकाल लेते थे उन्हें पकड़कर ....पिंड में तो एक छत से दूसरी छत पर आसानी से जाया जा सकता है ...'है नहीं था' अब तो वहाँ भी सब पक्के मकान बन गए हैं .....अब वो पहले सा मजा कहाँ ......!!

बचपन की यादों का अपना ही मज़ा है ....!!

हाँ आपसे बात कर अच्छा लगा ......शुक्रिया ....!!

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत रोचक संस्मरण है।धन्यवाद।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

यादे ... एक टानिक है जी, खुशनुमा जिन्दगी के लिये.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत रोचक संस्मरण है।धन्यवाद।

Prateek ने कहा…

मैं पंजाब कभी गया नहीं हूँ. मगर आपकी बातें सुनकर जाने का जी करता है. भूपिंदर के चौबारे में फिल्म देखने का मजा ही कुछ और होगा!

vrinda gandhi ने कहा…

bachpn ki masoon yadein..aaj knhi lop ho gayi hai ..har kamre mein personal pc aur t.v..wo bchpn hi bahut pyaara tha..acha lga apki yadon ki pitari se ek yaad ko padkar

बेनामी ने कहा…

खरगोश का संगीत राग रागेश्री
पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में
कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम
इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें
अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें
राग बागेश्री भी झलकता है.
..

हमारी फिल्म का संगीत वेद
नायेर ने दिया है... वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती
है...
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