शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2009

महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण


मैंने अपनी जिन्दगी में बहुत बार इस बात का अहसास किया है कि मर्दों के मुकाबले महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण ज्यादा रहा है। अगर आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे बहुत सी महिलाएं याद आती हैं, जिनका मेरे प्रति आकर्षण था, हर आकर्षण का मतलब शारीरिक संबंधों से नहीं होता। मुझे याद आ रहे हैं वो बचपन के दिन, जब मैं दारेवाला गाँव में स्थित अपने घर के बाहर मिट्टी में खेल रहा होता था और घर के भीतर मां काम में जुटी होती थी। जब मैं मिट्टी के साथ मिट्टी हो रहा होता, तो वहां से सिर पर घास की गठड़ी उठाएं जो भी महिलाएं गुजरती, वो मुझे बुलाकर एवं छेड़कर गुजरती, इतना ही नहीं कुछ तो मुझे अपनी उंगली पकड़ाकर अपने घर तक ले जाती, और मैं भी निश्चिंत उनके साथ चल देता।


एक बार तो मेरे गुम होने की अफवाह भी उड़ गई थी, अफवाह इस लिए कह रहा हूं क्योंकि मैं गुम हुआ ही नहीं था, मैं तो किसी के घर में ऊंट के साथ खेल रहा था। उधर, मेरे घरवालों ने आसपास के तीन गांवों की तलाशी ले ली, लेकिन अपने गांव को भूल गए। तब सब थक हारकर घर में आ गए तो किसी ने कहा कि तुम्हारा छोरा तो उस महिला के साथ मैंने जाते देखा था। जब उनके घर पहुंचे तो पता चला कि शैतान तो यहां ऊंट के साथ खेल रहा है। थोड़ा सा आगे बढ़ता हूं तो मुझे चौथी कक्षा वाली वो टीचर याद आती है, जो मुझको गोद में लेना चाहती थी, जो मुझे पढ़ाकर लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहती थी, अगर अन्य महिलाओं को मुझसे लगाव था तो मेरी माँ का लगाव कैसे कम हो सकता है। आखिर वो भी एक महिला थी। मेरी मां ने मुझे चौदह साल तक अपने साथ सुलाया, कभी न नुक्कर नहीं की। मैं सबसे ज्यादा मां के करीब रहा हूं, मैंने ही अपने बहन भाईयों में से सबसे ज्यादा मां का दूध पिया है।

स्कूल के समय लड़कियों के आकर्षण का केंद्र तो मैं हमेशा से ही बना रहा है, उससे भी दिलचस्प बात मुझे याद आती है कि कोई सुंदर जवान टीचर भी मुझे ज्यादा समय तक अपने सामने बैठने नहीं देती थी, जब मैं नौवीं कक्षा में था, तो एक टीचर ने यहां तक कह दिया था कि तुम सबसे पीछे बैठा करो, मैंने पूछा कौन मैडम जी, उन्होंने कहा कि मेरे ध्यान किताब पर केंद्रित नहीं हो पाता, इसका मतलब मैं कुछ भी नहीं समझा, आखिर क्यों उसका ध्यान डोल जाता है। आपको हैरानी होगी कि इस टीचर ने जब कई साल बीतने के बाद मेरी अखबार में छप्पी फोटो देखी तो फटाक से बोली शायद इस लड़के को मैं जानती हूं, जाने भी कैसे ना..ध्यान जो भटका देता था, ये फोटो इसलिए नहीं छप्पी थी कि मैं कोई चोर लुटेरा गैंग में शामिल हो गया था, बल्कि तब मैं दैनिक जागरण में काम करता था, और पाठकों को गिफ्ट प्रदान करते हुए फोटो खिंचवाने पड़ते थे। मैंने उपर 'हैरानी होगी' शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि शिक्षकों को स्टूडेंट याद नहीं रहते। इसका भी कारण है क्योंकि उनका कोई एक स्टूडेंट नहीं होता, हजारों स्टूडेंट होते हैं।

लड़कियों की लिस्ट लम्बी है, इसलिए उनको की बात न करते हुए, एक और महिला की बात करता हूं, जब मैंने छोटे से शहर से बड़े शहर की तरफ कूच किया तो एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। मुझे सबसे ज्यादा नफरत बार बार बैठकें बुलाने से होती है, तब तो खासकर जब आप एक ही मुद्दे को बार बार दोहरा रहे हों। इस कंपनी में मुझे निरंतर कई बैठकों में भाग लेना पड़ा, मैं तो एक ही मुद्दे से तंग आ जाता हूं, इसलिए मैं सामने वाले को देखकर बैठक में टाईम पास करने लगता हूं, या फिर उसकी मूर्खता पर मन ही मन में मुस्कराता हूं, जिसके कारण मेरी आंखों में एक अजब सी चमक आ जाती है, शायद किसी लड़की को आकर्षित करने के लिए वो चमक होनी बहुत जरूरी होती है।

बैठक चल रही थी शायद 12वीं बैठक थी जो एक ही मुद्दे पर थी, और एक ही उसको संबोधन करने वाला, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मूर्ख कौन है वो कि हम? इतने में बैठक को संबोधन कर रही महिला ने बीच में रुकते हुए कहा कि तुम मुझे इस तरह मत देखो, मैं हाजिर जवाबी हूं, मैंने तुरंत कहा कि ठीक है अगली बार काला चश्मा पहनकर आऊंगा, अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, वो भी कोई कम आकर्षित करने वाली चीज तो न थी, अगर आप किसी सुंदर चीज देख नहीं सकते, तो दुनिया में आने का कोई फायदा नहीं और उस वक्त जब आपको कोई मुफ्त में समय दे रहा है। लेकिन उस कंपनी में वो ही एक ऐसी महिला थी, जिसने मुझे फोन करके अच्छे डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा। ये तब की बात है, जब मैं एक दिन बिमार होने के कारण ऑफिस से घर की तरफ जा रहा था, और किसी का फोन नहीं आया, जबकि अगले दिन सबने पूछा अब कैसे अब कैसे हो?

एक और किस्सा याद आ रहा, छोटा करके सुनाता हूं। मैं अब भी उसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा था कि अचानक एक दिन रास्ते में मुझे एक लड़की ने रोका और शुरू हो गई। सब उगल दिया जितना जहर उसके मन में कंपनी के प्रति भरा हुआ था, मैं हैरान था कि इस लड़की ने ऑफिस में कभी चाय का कप तक शेयर नहीं किया और आज एकदम से मुझे बीच रास्ते शुरू पड़ गई क्या इसको डर नहीं लगता कि मैं ऑफिस वालों को उसकी सारी बात बता दूंगा। शायद वो मुझे पहचान चुकी थी कि मैं तो एक बागी किस्म का लड़का हूं। जब आपको कोई हर रोज नोटिस करता है तो वो आपको आपसे ज्यादा जानने लगता है।

मेरी मकान मालिकन कहती है कि तुम को रिश्तों की कदर नहीं, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी ज्यादा इज्जत करती हूं। मुझे इस बात की समझ भी नहीं आई, जब मुझे रिश्तों की कदर नहीं, अगर मुझे समाज की समझ नहीं, अगर मुझे कोई समझ नहीं तो वो मेरी इज्जत क्यों करे। शायद उसका मेरे प्रति आकर्षक ही उसको मेरी इज्जत करने के लिए मजबूर करता है, लेकिन मैं फिर दोहरा रहा हूं कि आकर्षण का मतलब सदैव शारीरिक संबंधों से नहीं होता। और होना भी नहीं चाहिए, फूल हमको आकर्षित करते हैं क्या हम उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश कर सकते है? सुंदर चीजें हमेशा आकर्षित करती हैं, लेकिन मैं खुद को सुंदर नहीं कह रहा, हो सकता है कि सामने वाली निगाहें ही सुंदर हो, जिनको मैं हमेशा ही सुंदर दिखाई देता हूं।

मुझे कुछ और महिलाएं याद आ रही हैं...इस लिए एक और किश्त जल्द जारी करूंगा।

9 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

रचना तो अच्छी, मजेदार लगी भाई लेकिन एक बात समझ नहीं आयी जब आपकी फोटो अखबार में आयी थी तब आपकी टीचर ने आपका फोटो देखकर कहा कि मैंने इसे कहीं देखा है , जब टीचर ये कह रही थी तो आप वहीं थे क्या ?

कुलवंत हैप्पी ने कहा…

ये बात उनके पति देव ने मुझसे कही थी, जब वो उसके बाद मुझसे मिलने आए थे और उन्होंने एक मैगजीन की शुरूआत करनी थी।

Nirmla Kapila ने कहा…

वाह बेटा! इतना गुमान भी अच्छा नहीं होता ।वैसे हमे पता चल गया है कि तुम वास्तव मे खूबसूरत होगे और खूबसूरत चीज़ हर किसी को अच्छी लगती है । अब फूल कर कुप्पा ना हो जाना बधाई

mark rai ने कहा…

kaphi dino baad aapke darshan hue aur....ye aapka anubhaw bhi shaandaar hai...

परमजीत बाली ने कहा…

रोचक संस्मरण है।

Arvind Mishra ने कहा…

ज़रा वेक अप सिड देख आईये !

शरद कोकास ने कहा…

भई यह कितनी किश्त तक चलेगा ताकि हम भी कुछ पूर्वानुमान लगालें ?

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

वैसे ये लिखने की अभी सही उम्र नहीं है,कुछ समय और इंतजार कर लेते...!शायद हमें कई किश्तें पढ़नी पड़ेगी...

KK Yadav ने कहा…

बेहतरीन -- बहुत सुन्दर.