हम जाने आने में किसी के दिल को चोट पहुंचा देते हैं। हम को ध्यान रखना चाहिए। आपका दोस्त एक शानदार मोबाइल खरीदकर लाता है। आप उसको देखते ही तपाक से बोलते हैं। यह तुमने गलत किया। इस कंपनी का मोबाइल नहीं लेकर आना था। अचानक वो कहता है, मैंने बहुत देख व पूछ ताछ करने के बाद लिया है। सब का अनुभव अच्छा है।
हो सकता है कि हमारा अनुभव खराब रहा हो, लेकिन जब सामने वाला फैसला कर चुका हो तो हमको एक बात याद रखनी चाहिए कि उसके मन को केवल अगर अब कोई बदल सकता है तो केवल और केवल उसका अनुभव।
आप अधिक जोर देंगे। अगली आपकी सलाह तो क्या वो आपको अपनी चीज दिखाने से भी कतराएगा। दोस्त अच्छे के लिए होते हैं, लेकिन कभी कभी सामने वाले की मानसिकता को भी समझना भी जरूरी होता है।
इसको कुछ महत्वपूर्ण मामलों से जोड़कर न देखें। यह केवल बाजारी वस्तुओं पर लागू होने वाली बात है। कुछ मुद्दों पर तर्क वितर्क होना चाहिए। किसी भी कीमत पर।
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शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014
कहीं किसी को चोट तो नहीं पहुंचा रहे
बुधवार, अगस्त 22, 2012
जितेंद्र गोभीवाला- तेरी सर्कस ही अलहदा थी यार
मेरी और जितेंद्र गोभीवाला की पहली मुलाकात आज से करीबन दस पहले हुई थी, जब मैं गांव से बठिंडा शहर पहुंचकर दैनिक जागरण में अपने कैरियर की शुरूआत कर रहा था, और जितेंद्र गोभीवाला की कामेडी भरपूर कैसिट 'कट्टा चोरी हो गया' रिलीज हुई थी। वो छोटी सी मुलाकात, कुछ समय बाद एक अच्छी दोस्ती में बदल गई। उसका कारण एक ही था, जितेंद्र गोभीवाला का मिलनसार व्यवहार और हमारा दोनों का समाज सेवा से लगाव, और एक ही संस्था से जुड़ाव।
मैं मीडिया लाइन में नया था, और मीडिया वालों का एक टिकाना था 'मेहना चौंक' स्थित यूनाइटेड वेलफेयर सोसायटी का ऑफिस या तहसील। यहां पर जितेंद्र से कई बार मुलाकातें हुई। उसको करीब से जानने का मौका मिला। वो कलाकार बाद में पहले दोस्त था। कट्टा चोरी हो गया के बाद जितेंद्र गोभीवाला की दूसरी वीडियो सीडी आई लो कर लो गल्ल। अब जितेंद्र स्टेज शो छोड़कर अपने नए प्रोजेक्ट की तरफ बढ़ रहा था कि मुझे शहर छोड़ना पड़ा और उसको बीमारी ने अपनी जकड़ में ले लिया।
उसके बीमार होने की ख़बर मुझे मध्यप्रदेश में मिली तो दिल पीड़ा से तड़फ उठा। उसकी सलामती के लिए दुआ की। पिछले पांच छह सालों में एक वक्त तो ऐसा भी आया, जब लगता था कि अब जितेंद्र जाएगा हम को छोड़कर। मगर दुआओं ने अपना असर दिखाया, जितेंद्र गोभीवाला फिर से तंदरुस्त होने लगा। मगर बीमारी अंदर अंदर खा रही थी, पर चेहरे पे शिकन तक नहीं थी। बस जब भी मिलता हंसते हुए मिलता। मैं और जितेंद्र एक बार चैकअप के लिए चंडीगढ़ पीजीआई गए, वो पूरे सफर ऐसे मस्त मौला इंसान की तरह बातें करता हुआ गया जैसे वो मुझे सांत्वना दे रहा हो, और मानो वो बीमार नहीं, मैं बीमार हूं।
मेरी और उसकी अंतिम मुलाकात डेढ़ माह पूर्व उसकी बीबीवाला चौंक दुकान पर हुई, जहां पर पहले भी बहुत सी मुलाकातें हुई। इस बार वो काफी तंदरुस्त नजर आ रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने कहा, इस बार सर्कस पक्का लगाएंगे। सर्कस उसका तकियाकलाम था। मुझे नहीं पता था, दोस्त तू इस बार इतनी बड़ी सर्कस लगा जाएगा, वो भी बिना बताए।
कॉलेज में पढ़ाई करते हुए कामेडी का शौक पड़ गया और जसविंदर भल्ला को अपना गुरू धारण कर लिया। उनके सन्निध्य में उनके साथ जितेंद्र ने कई बार काम भी किया। जितेंद्र गोभीवाला की अंतिम वीडीसी लो कर लो गल्ल थी, मगर वो आगे के लिए कुछ संजो रहा था, लेकिन वो उस को दुनिया के सामने रखता कि भगवान ने उसको अपने पास बुला लिया। जिन्दगी के बुरे वक्त में भी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने परिवार और दोस्तों को उसी तरह दर्द छुपाकर हंसाता रहा, जैसे एक कामेडियन घर के दर्द को सीने में दबाकर अपनी बातों से जमाने को हंसाता है। मगर उसकी अचानक विदाई ने आंखें नम कर गई।
मैं मीडिया लाइन में नया था, और मीडिया वालों का एक टिकाना था 'मेहना चौंक' स्थित यूनाइटेड वेलफेयर सोसायटी का ऑफिस या तहसील। यहां पर जितेंद्र से कई बार मुलाकातें हुई। उसको करीब से जानने का मौका मिला। वो कलाकार बाद में पहले दोस्त था। कट्टा चोरी हो गया के बाद जितेंद्र गोभीवाला की दूसरी वीडियो सीडी आई लो कर लो गल्ल। अब जितेंद्र स्टेज शो छोड़कर अपने नए प्रोजेक्ट की तरफ बढ़ रहा था कि मुझे शहर छोड़ना पड़ा और उसको बीमारी ने अपनी जकड़ में ले लिया।
उसके बीमार होने की ख़बर मुझे मध्यप्रदेश में मिली तो दिल पीड़ा से तड़फ उठा। उसकी सलामती के लिए दुआ की। पिछले पांच छह सालों में एक वक्त तो ऐसा भी आया, जब लगता था कि अब जितेंद्र जाएगा हम को छोड़कर। मगर दुआओं ने अपना असर दिखाया, जितेंद्र गोभीवाला फिर से तंदरुस्त होने लगा। मगर बीमारी अंदर अंदर खा रही थी, पर चेहरे पे शिकन तक नहीं थी। बस जब भी मिलता हंसते हुए मिलता। मैं और जितेंद्र एक बार चैकअप के लिए चंडीगढ़ पीजीआई गए, वो पूरे सफर ऐसे मस्त मौला इंसान की तरह बातें करता हुआ गया जैसे वो मुझे सांत्वना दे रहा हो, और मानो वो बीमार नहीं, मैं बीमार हूं।
मेरी और उसकी अंतिम मुलाकात डेढ़ माह पूर्व उसकी बीबीवाला चौंक दुकान पर हुई, जहां पर पहले भी बहुत सी मुलाकातें हुई। इस बार वो काफी तंदरुस्त नजर आ रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने कहा, इस बार सर्कस पक्का लगाएंगे। सर्कस उसका तकियाकलाम था। मुझे नहीं पता था, दोस्त तू इस बार इतनी बड़ी सर्कस लगा जाएगा, वो भी बिना बताए।
कॉलेज में पढ़ाई करते हुए कामेडी का शौक पड़ गया और जसविंदर भल्ला को अपना गुरू धारण कर लिया। उनके सन्निध्य में उनके साथ जितेंद्र ने कई बार काम भी किया। जितेंद्र गोभीवाला की अंतिम वीडीसी लो कर लो गल्ल थी, मगर वो आगे के लिए कुछ संजो रहा था, लेकिन वो उस को दुनिया के सामने रखता कि भगवान ने उसको अपने पास बुला लिया। जिन्दगी के बुरे वक्त में भी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने परिवार और दोस्तों को उसी तरह दर्द छुपाकर हंसाता रहा, जैसे एक कामेडियन घर के दर्द को सीने में दबाकर अपनी बातों से जमाने को हंसाता है। मगर उसकी अचानक विदाई ने आंखें नम कर गई।
कुलवंत हैप्पी
शुक्रवार, जून 08, 2012
लोग कहते हैं एक लाइन से जिन्दगी नहीं बदलती
मैं कभी नहीं भूल सकता उस शख्स को, नहीं नहीं यार मेरा उसकी ओर कोई उधार बाकी नहीं, बल्कि यह तो वो शख्स है, जिसने जिन्दगी के कुछ साल मांगे थे, और मैं मना करके भाग आया था। बस उसकी बातों को साथ लेकर और एक शेयर, शेयर कर रहा हूं, जो इनकी जुबान से निकला था :)
वक्त की वक्त से मुलाकात थी
वक्त को वक्त ही न मिल पाया
ये भी वक्त की बात थी
वक्त को वक्त ही न मिल पाया
ये भी वक्त की बात थी
जबकि इससे पहले मेरे पास दिलवाले फिल्म का एक शेयर था, जो अजय देवगन बोलता है।
हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था।
मेरी कश्ती वहीं डूबी जहां पानी बहुत कम था।
मेरी कश्ती वहीं डूबी जहां पानी बहुत कम था।
वो शख्स था मेरा स्कूल टीचर सुरजीत सिंह, जिसने मुझे लूटा नहीं, बल्कि जिन्दगी की एक नई दिशा से रूबरू करवाया:)
उन्होंने लव मैरिज की थी, वो लव मैरिज के खिलाफ नहीं थे, और मैं तो पक्का कमीना शकल से लेकिन दिल से नहीं। उनको शक था कि मेरा ध्यान लड़कियों में है, उन्होंने मुझे अपनी कसम दे डाली, यह कहते हुए कि तुम मेरे छोटे भाई जैसे हो:)
किसी छात्र के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है कि उसका शिक्षक उसको भैया की उपाधि से नवाज दे:) कसम यह दी कि तुम किसी लड़की से प्यार नहीं करोगे, जब तक अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते :) ऐसा नहीं था कि मैं उन दिनों अपाहिज था, उनके कहने का अर्थ आप भी समझते हैं और मैं भी उन दिनों समझ गया था।
अब मेरे लिए वहां रुकना मुश्किल था, एक तरफ शिक्षक जो अब भाई बन चुका था, दूसरी वो लड़की जिसको मैं पसंद करता था, प्यार तो पता नहीं, क्यूंकि मेरे प्यार की भाषा तो आज तक में भी नहीं समझ पाया कि आखिर मैं प्यार किसे करता हूं और किसे नहीं।
उसके बाद आज तक उस शिक्षक और लड़की से मिला नहीं, लेकिन उन दोनों का चेहरा बराबर मुझे याद है। उनका वो शेयर अब भी दिल में बसता है। मिला वक्त तो उस वक्त से मुलाकात जरूर करूंगा।
गुरुवार, जून 02, 2011
जॉब छोड़ने के एक साल बाद
आज हर कोई पैसा कमाना चाहता है, वो भी इतना कि वह अपने सपनों को साकार कर सके, लेकिन हिन्दुस्तान में नौकरी व्यवस्था ऐसी है कि वह आपको अमीर बनने भी नहीं देती और भूखा मरने भी नहीं देती। ऐसे में लाजमी है कि हर व्यक्ित ऐसा अवसर ढूंढता है जहां से वह अपने सपनों को साकार करने लायक आमदन कमा सके। मैं भी उन लोगों में ही शामिल हुं, लेकिन पैसा कमाने के लिए उस रास्ते पर कभी नहीं चलता, जिसके लिए मेरी आत्मा मुझे आज्ञा नहीं देती। आप सभी की तरह मेरी आंखों में भी सपने हैं, और उन सपनों को साकार करने की शक्ित, जो मुझे ईश्वर की ओर से तोहफे में मिली है, मुझे भगवान ने वार्निग डिजायर का गुण बख्शा हुआ है, जो बच्चों में होता है। वो अपनी हठ पूरी करने के लिए मां बाप को मजबूर कर देते हैं, और मेरे हिसाब से यह सारी सृष्टि मानव के लिए मां बाप से कम नहीं। जिन जिन लोगों ने वर्निंग डिजायर की, सृष्टि ने तथास्तु कहते हुए उसको पूरा किया, चाहे वो वॉल्ट डिजनी हो या फिर बिल गेट्स। मेरी बचपन से इच्छा थी, कोई ऐसा बिजनस करूं, जिससे में कुछ लोगों की जिन्दगियां बदल सकूं, और जो प्यार दुनिया ने मुझे दिया उसका कुछ कर्ज अदा कर सकूं। मुझे याद है, इस बिजनस के मिलने से एक साल पहले मैंने एक बेहतरीन जॉब को छोड़ते हुए जॉब खोने का मलाल करने की बजाय, कंपनी अधिकारियों के सामने कुछ शब्द कहे थे, जो आज आपके सामने कहने जा रहा हूं, मुझे लेखक बनना है और मुझे एक बेहतरीन जिन्दगी जीनी है, और मुझे आम आदमी की मौत नहीं मरना, मैं खुद का बिजनस खड़ा करूंगा और भारत के तीन शहरों में से किसी एक में रहना पसंद करूंगा, चंडीगढ़, दून और गांधीनगर। मैं जॉब छोड़ने के बाद पंजाब चला गया था, लेकिन उन शब्दों को कुदरत ने चुपके से सुन लिया था, और एक साल पूरा होने से पहले कुदरत ने मुझे गांधीनगर में भेज दिया एक नए बिजनस के साथ। उन शब्दों के मुताबिक ईश्वर ने मुझे बिजनस और शहर दे दिया, असल में कहूं तो एक बेहतरीन जिन्दगी जीने का एक सुनहरा अवसर, अब मैं इस अवसर को घोषणा नहीं चाहता, इस लिए एक साल पहले कहे हुए शब्दों को याद करते हुए मैंने अपने एक और सपने को साकार करने की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए, जी हां, लेखक बनने की ओर। जब कुदरत मेरा साथ दे रही है तो मुझे कोशिश करने में क्या गुरेज है। मैंने किताब लिखने के लिए भी प्रयत्न करने शुरू कर दिए, एक बेहतरीन बुक लिखने के लिए, मैं घोषणा कर रहा हूं कि मैं किताब लिख रहा हूं, जैसे ही घोषणा की तो एक दोस्त ने सुन लिया और कहा, इतना उत्साह अच्छा नहीं होता, तुम असफल हुए तो लोग हंसेंगे, मैंने कहा, अगर असफन न हुए तो, सफलता के लिए तालियां भी तो यही बजाएंगे। उसने फिर रोका, लेकिन मैंने अब उसकी बात को चुनौती के रूप में ले लिया, और काम को तेज कर दिया। मैं सोचता हूं, हम घोषणाएं करने से क्यों डरते हैं, हमको घोषणाएं करनी चाहिए, जैसे कुछ फिल्म निर्देशक फिल्मों की घोषणाएं करते हैं, और वो फिल्में अधर में अटक जाती हैं क्या वह निर्देशक फिल्में बनाना बंद कर देते हैं, नहीं, वह अगले प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर देते हैं, जब समय अच्छा होने लगता है तो पुरानी घोषणाओं को पूरा कर देते हैं। मैं नए बिजनस और अपनी घोषणाओं के साथ गांधीनगर गुजरात शिफट हो चुका हूं, उम्मीद है कि एक बेहतरीन जीवन जीकर इस दुनिया से विदा लूंगा। बाकी बातें बाद में दोस्तों फिर मिलेंगे। घोषणाएं करो, याद रखो कोई सुन रहा है।
रविवार, मार्च 27, 2011
रास्ते में राधिका मिल गई
लम्बे समय के बाद फिर से खुली खिडक़ी पर लौटा हूं। मुझे पता है कि आपको लोगों को मेरी अगली किश्त का इंतजार नहीं रहता, क्योंकि न तो मैं चेतन भगत हूं और न बिग अड्डा का अमिताभ बच्चन, एक साधारण भारतीय हूं, और कुछ लोगों की तरह मुझे भी डायरी लिखने का शौक है, पर सार्वजनिक रूप में, निजी नहीं। आज की किश्त में एक रेल यात्रा के बारे में बताने जा रहा हूं, जोकि मेहसाना से शुरू होती है और बठिंडा सिटी के रेलवे स्टेशन पर खत्म। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, लेकिन कोर्स की किताबें नहीं, बल्कि पत्रिकाएं व जानकारी देने वाले रोचक समाचार पत्रों के पन्ने। मैं शनिवार को जैसे ही मेहसाना के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो मुझे वहां लगे ब्लॉक ने बताया दिया था कि गाड़ी आने में अभी एक घंटा बाकी है। इस एक घंटे को कैसे गुजारा जाए, इस पर मैंने बिल्कुल विचार नहीं किया, क्योंकि रेलवे स्टेशन में प्रवेश करते ही मेरी निगाह वहां स्थित बुक स्टॉल पर पड़ी, जहां पर बहुत सारी पत्रिकाएं व एक हिन्दी का न्यूजपेपर पड़ा था, जिसका नाम था राजस्थान पत्रिका, मैंने इस समाचार पत्र व दैनिक भास्कर की पत्रिका लक्ष्य को खरीदा, सच में दोनों पढ़ने के बाद लगा कि मैंने इस बार भी गलत जगह पैसे खर्च नहीं किए। लक्ष्य पत्रिका में भी पॉजिटिव थिंक की बातें लिखी हुई थी, और राजस्थान पत्रिका के मी डॉट नेक्सट में भी पॉजिटिव एटिट्यूड से संबंधित भरपूर जानकारी थी। दोनों को पढ़ते पढ़ते कम समय निकल गया पता ही नहीं चला। इतने में रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई। मैं बैग उठाकर रेल गाड़ी की तरफ बढ़ा, लेकिन दिमाग इन दोनों चीजों में अभी भी मगन था। मैं एस सिक्स में घुसा और अपनी सीट नम्बर के पास गया था तो पता चला कि मेरी सीट एस सिक्स में नहीं और एस सेवन में है, मैं सॉरी बोलते हुए कोच से बाहर की तरफ दौड़ा और पहुंच गया अपनी सीट पर। मैं पूरी तरह चुपचाप, मानो जैसे में मौन धारण कर लिया हो। यह रिजर्वेशन कोच, मुझे जनरल कोच जैसा लग रहा था, क्योंकि मेरे जाने से पूर्व मेरी वाली सीट पर पांच जन बैठे हुए थे, जबकि सामने वाली सीटों पर छोटे छोटे बच्चे लेटे नींद का आनंद ले रहे थे। इस कोच सवार ज्यादा लोगों को माउंट आबू रोड़ उतरना था। एक व्यक्ति के मोबाइल पर गीत बज रहे थे, लेकिन मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। जो समाचार पत्र व पत्रिका रेलवे स्टेशन पर पढ़ी, उसमें एक बात थी कि चुनौतियों को देखकर घबराओ मत, उनका मुकाबला करो। यह परिस्थिति ऐसी थी, जिसको हैंडल करना जरूरी था, बिना किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाए। मेरी निगाह मेरे सामने बैठी एक लडक़ी पर गई, जिसकी मोटी मोटी आंखों में काजल डाला हुआ था, वो बिल्कुल जब वी मेट की करीना जैसी नजर आ रही थी, लेकिन उसको भी वहीं तक जाना था जहां तक मेरी सीट पर बैठे लोगों को। वो अपने सामने बैठे एक व्यक्ति से बातें करने में मस्त थी, और बीच बीच में मुझे भी देख रही थी। वो निरंतर बोल रहा था, वह अलग अलग मुद्राओं में हां का संकेत देते हुए बातें सुन रही थी। मैं उसकी बदलती मुद्राओं को देखता रहा था, ताकि मेरे आस पास फैली अव्यवस्था पर मेरा ध्यान न जाए। कुछ घंटों के बाद माउंट आबू रोड़ आ गया, और रेलगाड़ी खाली हो गई एवं वो युवती भी उसी भीड़ केञ् साथ उतर गई। रेलगाड़ी खाली हुई एवं रोटी खाई और नींद का आनंद लिया। कुछ घंटों पश्चात गाड़ी फालना स्टेशन पर पहुंची और मैं घूमने के लिए थोड़ा नीचे उतरा तो आकर देखा मेरा बैग सीट के नीचे से निकालकर एक महिला ने अपने बैग वहां पर ठूंस दिए, मैंने अपना बैग अन्य जगह पर रख दिया। अब मेरी सीट के आस पास वाली छह सीटों पर पंजाबी गुजराती परिवार बैठा था, दोनों हिन्दी बोलना नहीं जानते थे, दोनों बातें करते एक दूसरे से लेकिन अपनी अपनी भाषा में। ऐसे में कुछ बातें समझाने के लिए मैं उनका ट्रांसलेटर बना, क्योंकि मेरा तालुक दोनों राज्यों से है। पंजाबी पूरी तरह जानता हूं तो गुजराती समझता हूं। धीरे धीरे सूर्य डूबता चला गया एवं अंधेरे की चादर फैलती चली गई। जोधपुर गाड़ी नौ बजे के करीब पहुंची। यहां पर एक यंग कपल हमारी सीटों के नजदीक पहुंचा। इस कपल के आने से मेरी उदासी भाग गई, जो मुझे कुछ कुछ पल बाद पकड़ रही थी। ऐसा नहीं कि यंग कपल में यंग लेडी मुझे अच्छी लग रही थी। इस यंग कपल के साथ एक छोटी सी उनकी बेटी थी, बिल्कुञ्ल रिदम जैसी। रिदम मेरी बेटी, जिसको नाना केञ् घर छोडक़र मैं पंजाब लौट रहा था। उसे बहुत ज्यादा मिस कर रहा था, उस बच्ची को देखकर मुझे रिदम याद आ रही थी, वो बच्ची बिल्कुञ्ल रिदम जैसी थी, लेकिन रिदम से पांच माह बड़ी। रिदम ने मेरे सफर पर निकलने से पहले खुद चलकर पांच फूट का सफर तय किया, जबकि राधिका बिंदास चल रही थी। रिदम की तरह राधिका ने भी अपने पापा को देर रात तक नहीं सोने दिया। वो उसको सुलाने की कोशिश करें तो वह रिदम की तरह ही चीखे। राधिका का बाप भी मेरी तरह उसको उठाकर रेलगाड़ी में घुमाने ले गया, ताकि कोई डिस्टर्ब न हो। एक चक्कर काटने के बाद राधिका करीबन सवा बारह बजे के करीब सो गई, तभी वहां टीटी आया, एवं 46 सीट पर सो रहे युवक से टिकट मांगा। वो टिकट दिखा रहा था कि इतने में दो अन्य यात्री टीटी केञ् पास आए एवं सीट देने का अनुरोध करने लगे, टीटी ने सख्ती से डांट फटकार लगाते हुए उनको वहां से भगा दिया एवं युवक की टिकट वापिस लौटते हुए सौ रुपए का नोट पकडक़र टीटी वहां से आगे बढ़ गया। कैञ्से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार, जिसकी जन्मदाता ही पब्लिक है। सोचते सोचते सो गया एवं सुबह उठा तो बठिंडा के बिल्कुल पास था। उठते ही निगाह सबसे पहले राधिका पर गई, जो धीमी आवाज में पापा वाली सीट पर खड़ी होकर मम्मी को उठने के लिए अनुरोध कर रही थी।
बुधवार, जुलाई 21, 2010
पिछले डेढ़ महीना-बिरह का महीना
पिछला डेढ़ महीना, मेरे लिए बिरह का महीना रहा। इस दौरान कितने ही लोग अचानक जिन्दगी से चले गए, कुछ सदा के लिए और कुछ फिर मिलने का वायदा कर। हमारी कंपनी आर्थिक तंगी की चपेट में उस वक्त आई, जब आर्थिक तंगी के शिकार देश वेंटीलेटर स्थिति से मुक्त हो चुके थे, कहूँ तो हमारी किश्तियों ने किनारों पर आकर जवाब दिया। जॉब जाने का कभी अफसोस नहीं हुआ, हां, लेकिन अगर अफसोस हुआ कुछ लोगों से जुदा होने का। जब भी जुदा होने का अफसोस अपनों से करने लगते तो अचानक किसी बुद्धजीवि की बात कहकर उस स्थिति को संभाल लिया जाता, अच्छे लोगों को एक जगह स्थाई नहीं होना चाहिए, पानी की तरह व रमते जोगियों की भांति चलते रहना चाहिए। ऐसी ढेरों बातें, जो जुदाई के गम को कम कर देती थी, एक दूसरे से हम दोस्त बोलते रहते थे। किसी ने कहा है, जमीनी फासले कितने भी क्यों न हों, बस दिलों में दूरियां नहीं होनी चाहिए। ऐसे हालातों में इंदौर छोड़ दिया, इंदौर छोड़ने का गम कम, खुशी ज्यादा थी, क्योंकि अपने शहर लौटना किसे अच्छा नहीं लगता। शाम ढले तो परिंदे भी घरों को लौट आते हैं, मैं तो फिर भी साढे तीन साल बाद अपने वतन लौट रहा था। इस डेढ़ महीने के दौरान मुझे पहला झटका उस दिन लगा, जिस दिन एक मित्र का सुबह सुबह फोन आया कि विशाल का छोटा भाई सड़क हादसे में घायल हो गया। इस सूचना ने मानो, प्राण ही निकाल लिए हों। सबसे पहले जुबां से वो ही शब्द निकले, जो किसी अपने के लिए निकलते हैं, हे भगवान मेरे सांसों से कुछ सांस ले, उसमें डाल दे। इंदौर शहर में अगर कोई दरियादिल इंसान मिला तो विशाल, अपने नाम की तरह विशाल। अगली सुबह दोस्त का फिर फोन आया, विशाल का भाई चल बसा। इतनी बात सुनने के बाद विशाल को फोन करने की हिम्मत नहीं थी, और मैंने किया भी नहीं, क्योंकि जब मैं ही भीतर से संभल नहीं पा रहा था, उसको क्या हिम्मत देता। मैंने अपने दोस्त को कहा कि तुम उसके पास जाओ और हिम्मत देना। किस्मत देखो, जनक को भी शाम की रेल गाड़ी से अपने घर लौटना था, वो भी जॉब छोड़ चुका था। मुझे और जनक को तो दुख इस बात का था कि विशाल का भाई चला गया, लेकिन विशाल की किस्मत देखो, वो इस महीने में मुझे, जनक, नितिन और न जाने कितने दोस्तों को अपने शहर से विदाई दे चुका था। सोमवार को विशाल का मेल मिला कि उसने ऑफिस ज्वॉइन कर लिया, यह मेरे थोड़ा सा राहतपूर्ण मेल था, क्योंकि ऑफिस का काम व दोस्तों का मिलवर्तन उसके दर्द को थोड़ा सा कम कर देंगे। मैंने पंजाब से गुजरात के लिए रवाना होते हुए रेलगाड़ी में उसको फोन किया, उसने बताया कि उसने किताब संन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेच दी को फिर से पढ़ना शुरू कर दिया, मैंने उसको बताया कि मैंने पिछले डेढ़ महीने में अच्छे दोस्तों की कमी न खले के चक्कर में चार किताबें पढ़ डाली, डेल कारनेगी की समुद्र तट पर पिआनो, ऑग मेंडिनो की विश्व का सबसे बड़ा चमत्कार, चौबीस घंटों में बदलें जिन्दगी पयॉलो क्योलो की अल्केमिस्ट, जिससे कुछ लोग कीमियागर के नाम से भी जानते हैं। रेल गाड़ी जैसे ही राजस्थान को क्रोस करते हुए गुजरात में इंटर होने लगी, तो मेरे मोबाइल पर संदेश आने लगे, यह संदेश नेटवर्क बदलने का अलर्ट नहीं थे, यह संदेश एक बेहद बुरी खबर लेकर आए थे। इनमें लिखा था, वेबदुनिया मराठी के पूर्व वरिष्ठ उप संपादक एक सड़क हादसे में चल बसे, पहले पहल तो खबर अविश्वासनीय लगी, लेकिन संदेशों के बाद कुछ मित्रों के फोन आए, जो इस बुरी खबर को सच होने की पुष्टि कर रहे थे। इस घटना में मुझे एक बार फिर से बेचैन कर दिया, आखिर हो क्या रहा है? जिन्दगी ने आखिर हम सबको किस तरह अलग थलग किया है। अभिनय कुलकर्णी, जिसे मैं जल्दबाजी में अभय कुलकर्णी कह जाता था, मेरी अंतिम मुलाकात तब हुई, जब मैं बेवदुनिया छोड़ने का फैसला कर चुका था, एक कांफ्रेंस रूम में। फैसला करने के बाद जैसे ही मैं वेबदुनिया के ऑफिस में पहुंचा तो सब मेरी प्रतिक्रिया जाने के लिए तैयार थे, आखिर क्या हुआ? क्यों कि इस बिरह के मौसम की शुरूआत मुझसे होने वाली थी। मैंने जैसे ही बताया कि मैं वेबदुनिया छोड़ने वाला हूँ, तो बात पूरे ऑफिस में जंगल की आग की तरह फैल गई। मेरे बाद शायद अभिनय कुलकर्णी को भी बुलाया जाना था, वो मेरा फैसला सुनने के बाद काफी बेचैन हो गए, होते भी क्यों न, आखिर पूरा परिवार जो इंदौर में बसा चुके थे, और कंपनी के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुके थे, कई अच्छे मौके उन्होंने अच्छे वक्त भी ठुकरा दिए थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी थी कि अब उन मौकों को आगे से जाकर मांगना था, जिनको ठुकरा चुके थे वो कई दफा। उसके दिन के बाद, मेरी और उनकी कोई बात नहीं हुई, लेकिन कल जैसे ही मुझे पता चला कि वो इस तरह दुनिया से चले गए, पांव तले से जमीन निकल गई। यह बेहद बुरी खबर थी मेरे लिए अब तक की, क्योंकि वेबदुनिया के क्षेत्रीय भाषा के जितने भी पोर्टल थे, उन पोर्टलों में सबसे बढ़िया वरिष्ठ उप संपादक थे, जिन्होंने लम्बे समय तक बिना किसी विवाद के अपना कार्यकाल खत्म किया, लेकिन वो इस तरह दुनिया से ही रुखस्त हो जाएंगे किसी ने नहीं सोचा था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।
मंगलवार, जून 01, 2010
पितृ पर्वत - मेरे लिए स्वर्ग सा
इंदौर में मेरी सबसे पसंदीदा जगह है पितृ पर्वत। जहाँ पहुंचते ही मैं तनाव मुक्त हो जाता हूँ, शायद इसलिए कि वहाँ बुजुर्गों का बसेरा है, और मुझे बुजुर्गों के साथ समय बिताना ब्लॉगिंग करने से भी ज्यादा प्यारा लगता है, लेकिन शर्त है कि बुजुर्ग सोच से युवा होने चाहिए। यहाँ पर बुजुर्गों की याद में पेड़ पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन यह पूरी तरह से नहीं कह सकता कि अपने बुजुर्गों की याद में लगाए इन पेड़ पौधों को कोई बाद में देखने आता भी है कि नहीं। चलो छोड़ो, वैसे भी हम खानापूर्ति में कुछ ज्यादा ही विश्वास करते हैं, इतना ही काफी है कि बुजुर्गों की याद में पेड़ पौधे तो लगते हैं। हो सकता है कि कभी कोई पोता या पोती अपने प्रेमी के साथ यहाँ घूमने आए, और उस पेड़ के तले बैठकर सुकून के पल गुजारे, जिसे बहुत पहले उनके परिजनों ने उनके पूर्वजों की याद में रोपा था। लेकिन मेरी हैरत की तब कोई हद नहीं रहती, जब कोई इंदौर में सालों से रह रहा व्यक्ति कहता है, वहाँ तो केवल पेड़ पौधे ही लगाए जाते हैं, वहाँ घूमे जैसी तो कोई चीज ही नहीं। वो चीज कहते हैं, जिसको मैं स्वर्ग कहता हूँ। रविवार शाम को अपने कुछ जान पहचान के लोगों के साथ पितृ पर्वत की सैर करने निकला, वो सब सालों से इंदौर में रह रहे हैं, लेकिन इस स्वर्ग से रूबरू कभी नहीं हुए, लेकिन रविवार जैसे ही उन्होंने यहाँ का नजारा देखा तो देखते ही रह गए। एक घंटे में लौटकर आने की सोचकर गए, करीब साढ़े तीन घंटों बाद घर की तरफ लौटे। वहाँ पहुंचकर जो आनंद मुझे मिलता है, वो मैं ही जानता हूँ, क्योंकि दुनिया में आनंद एवं सत्य को जानने के लिए खुद जाना पड़ता है, वरना दोनों सदैव अधूरे रहते हैं। इसके बाद पता नहीं, अब कब मौका मिलेगा, इन बुजुर्गों से मिलने का, जो पेड़ पौधों के रूप में खड़े मेरे इस स्वर्ग की शोभा को चार चाँद लगाते हैं, क्योंकि अब इस परिंदे का इंदौर से दाना पानी खत्म हो चुका है, और अपने घर की तरफ कूच कर रहा है। दिन प्रति दिन फैलते इंदौर को देखकर सोचता हूँ कि जब अगली बार इंदौर आऊंगा, अपने कुछ मित्रों से मिलने क्या इंदौर के बाहर बाहर स्थित इस स्वर्ग के दर्शन हो पाएंगे? क्यों यहाँ के भूमाफिया ऐसे हैं कि गार्डन तक बेचते हैं, और सरकारी अधिकारियों को भनक तक नहीं लगती।
शनिवार, मई 29, 2010
अलविदा दोस्तो, जिन्दगी रही तो हजार मुलाकातें
हैप्पी तेरा फोन, पास बैठे मेरे मित्र यशपाल शर्मा ने फोन को मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा। मैंने फोन को थामते हुए..हैल्लो हैल्लो किया, सामने से संदीप सर की आवाज आई, "हैप्पी तुमको आज दो बजे जयदीप सर ने रॉल्टा बजाज वाली बिल्डिंग में बुलाया है। मैं सीट से उठा, और पारूल को कहा, चलो जल्दी खाना खाकर आते हैं, क्योंकि मुझे रॉल्टा बजाज वाले दफ्तर जाना है, वहाँ जयदीप सर ने बुलाया है। हम घर आए, बहन खाना बनाने में लगी हुई थी, जल्दी जल्दी लाँच किया। पारूल ने मुझे कुछ ट्रिक दिए, जो मेरे लिए किसी काम के नहीं थे, क्योंकि मैं मौके और स्थिति को देखकर बात करने में यकीन रखता हूँ, मैंने उसको कहा, वहाँ कोई भी बात हो, तुम मुझसे शाम तक नहीं पूछोगी, क्योंकि आज तेरा जन्मदिन है, और मैं चाहता हूँ, तेरा आज का दिन अच्छा निकल जाए। फिर ऐसे ही अचानक मेरे मुँह से निकल गया, आज सर बुलाएंगे, और कहेंगे हैप्पी तुम कल से काम पर मत आना और अपने त्याग पत्र पर साईन कर दो। वो बोली फिर तो मजा आ जाएगा। मैंने जल्दी जल्दी उसको ऑफिस छोड़ और खुद रॉल्टा बजाज बिल्डिंग की तरफ निकल गया।
वहाँ पहुंचा तो वेटिंग करने के लिए कहा गया। वो ही सोफा था, वो ही स्वागत रूम, जब मैं आज से करीब साढ़े तीन साल पहले 27 दिसम्बर 2006 को वेबदुनिया में इंटरव्यू देने आया था, इंटरव्यू कैसा, पता ही था, नतीजा सकारात्मक जाएगा, हो सकता है पैसों को लेकर मामला अटक जाए, लेकिन मुझे पैसे से मोह कम है, वहाँ भी बात न अटकने वाली थी। उस इंटरव्यू में पास हुआ, तभी तो आज साढ़े तीन साल बाद फिर उसी स्गावत कक्ष में उसी सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, कब सर बुलाएंगे? और बताएंगे इस बार कितनी कितनी सैलरी बड़ी है, वो बात भूल गया जो पत्नि को मजाक मजाक में कहकर निकला था।
दो कप चाय पीने और काफी चेहरों को नहारते नहारते अब उबने लगा था कि इतने में अंदर जाने का फरमान आ गया। अंदर गया, वहाँ पर सर के अलावा कंपनी के अन्य उच्च अधिकारी भी उपस्थित थे। मुझे कुछ बातें सुनने के बाद साफ हो गया था कि बेटा जो बात पत्नि को बोलकर आया है, वो बात उस समय भले ही मजाक रही हो, लेकिन अब वो सत्य के इतने करीब थी कि मौन के समय जितने लब एक दूसरे के करीब होते हैं। कंपनी पदाधिकारियों ने मेरे सामने दो विकल्प रख दिए, एक त्याग पत्र और दूसरा विभाग बदलने का, तो मैंने त्याग पत्र वाला विकल्प मैंने झट से स्वीकार कर लिया। मुझे कोई अफसोस न हो रहा था, क्योंकि मेरे जेहन में गुरू हरिदत्त जोशी के संवाद बनिए की दुकान है, कब लात मारकर भगा दें, पता नहीं, रितेश श्रीवास्तव के संवाद, लाले की नौकरी है बाबू और रणधीर सिंह गिलपत्ती के संवाद मजदूरी करते हैं घूम रहे थे। जब मैं दैनिक जागरण बठिंडा में था, तो उक्त संवाद मेरे कानों में पड़ते ही रहते थे। इन संवादों ने मुझे तब तब बहुत शक्ति थी, जब जब मैंने नौकरियाँ त्यागी। मेरा मानना है कि जब एक दरवाजा बंद होता है तो कई और दरवाजे तुम्हारे लिए खुल चुके होते हैं। इस बात को सत्य होते हुए मैंने कई दफा देखा, और इस बार भी देख रहा हूँ, दोस्तो।
मुझे तो इंतजार था, इस दिन का, और मैं वतन वापसी के लिए तो बहुत समय से उतावला था, लेकिन कहते हैं वक्त से पहले और तकदीर से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। मुझे बहुत कुछ मिला है, जिसके लिए मेरी जिन्दगी में आने वाले हर शख्स का मैं ऋणि हूँ। इस संस्थान से भी मुझे बहुत कुछ मिला है, अगर यहाँ तक न आता तो शायद कभी ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम न रख पाता। शायद इतना कुछ लिखने का साहस भी न कर पाता। मुझे इस संस्थान की बदौलत एक से एक बढ़कर इंसान मिले, जिनसे मुझे कुछ न कुछ सिखने को मिला, प्यार स्नेह तो अलग से। आज मुझे इस संस्थान से कोई गिला नहीं, और नाहीं होगा। शुरू शुरू में जरूर था, लेकिन तब न-समझ था, सुविधाएं ढूँढने के चक्कर में कंपनी को कोसता था, लेकिन जब समझ में आया कि सुविधाओं से तो कोई भी बेहतर कर लेता है, मजा तो तब है प्यारे, अगर आप असुविधाओं में रहकर कुछ बेहतर कर पाओ।अलविदा दोस्तो..जिन्दगी रही तो हजार मुलाकातें..नहीं तो, कहीं नहीं गई यादें और बातें।
शुक्रवार, मई 07, 2010
लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।
गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। जब गाँव से निकला था, बड़ी मुश्किल से 18 साल का हूँगा। माँ ने रोका था, मत जा शहर अभी तुम बहुत छोटे हो। अभी तुम हमारे साथ यहाँ रहो। शहर में बहुत भीड़ भाड़ है। तुमको अंधेरे से डर लगता है। अभी तुम पढ़ाई करो। नौकरी नाकरी बाद में कर लेना, लेकिन गाँव में रहने के लिए कुछ न था, किसके भरोसे रहता। वो माँ भी जानती थी, लेकिन माँ तो आखिर माँ होती है। वो कैसे अपने जिगर के टुकड़े को कुछ कागज के टुकड़ों के लिए आँखों से ओझल कर दे।
गाँव छोड़ने के बाद मेरी स्थिति शादी कर चली गई लड़की जैसी हो गई, जो ससुराल में इतनी व्यस्त हो गई कि मायके में बस कभी कभार कुछ पलों के लिए ही आना होता है। माँ की दवाई लेकर जाना, गाँव जाने का एक मात्र बहाना हो गया था, इसके अलावा कुछ नहीं। बस माँ के दर्शन किए, दवाई थमाई, और हालचाल पूछा नहीं कि बस ने गाँव के दूसरे बस स्टेंड से हॉर्न बजा दिया, जैसे कह रही हो प्लीज हरी! अप। जो माँ मेरे लिए बनाती वो घर में बहन के लिए ही छूट जाता, वो बीमार थी, लेकिन बेटे के आने की बात सुनते ही तंदरुस्त हो उठी, पता नहीं क्या ऊर्जा थी बेटे के आने की खबर में, और मैं भागती जिन्दगी में सोच ही नहीं पाया कि जिन्दगी हमारी मुट्ठी में भरी रेत की तरह कण कण होकर फिसल रही है। जिन्दगी एक सफर है, इसको कहीं न कहीं तो खत्म होना है, शायद किसी का पहले और किसी का बाद में।
माँ बीमार थी, लेकिन फिर भी जब मैं शहर से फोन लगाता तो माँ सबसे पहले मेरा हाल पूछती, जबकि हाल तो मुझे पूछना होता था उसका। उस समय मेरे घर में एक भी फोन नहीं थी, लेकिन आज वो नहीं तो घर में तीन तीन फोन हैं, घर का अलग, भाई का अलग और पिता का। वो दंग रह जाती जब मैं उसको बताता कि मैं ऑफिस में से बहुत देर रात निकलता हूँ घर के लिए, क्योंकि वो जानती थी मैं अंधेरे से बहुत डरता था, इतना कि पेशाब करने के लिए भी रात को रोशनी से परे एक कदम भी नहीं उठाता था। फिर पूछती खाना पीना तो अच्छा है, हाँ तेरी मौसी बता रही थी कि तुम दिन में एक बार खाना खाने लग गए हो, तो मैं कहता नहीं नहीं बाज़ार से कुछ खा लेता हूँ। कैसे कहता कि माँ मुझे रोटियाँ अच्छी नहीं लगती। गाँव में दिन की 27 रोटियाँ तोड़ने वाला शहर की भाग दौड़ में सिर्फ पाँच छ: रोटियों पर आ गया है। उसको कैसे बताऊं कि शहर आकर जाना है मैंने रोटियाँ गिनकर बनाई जाती हैं, तेरी तरह नहीं कि रोटियों से छाबा (रोटियाँ रखने वाला स्तूत की लड़की से बना डिब्बा) भरकर रख दो, जब चाहे मेरे बच्चों का मन करे खा लें।
बेटे से दूर गाँव में रहना अब मुश्किल हो रहा था, शायद इसलिए एक दिन उसने फैसला किया कि अब वो शहर रहेगी, शहर की फिजाओं को माँ का फैसला ठीक न लगा, और जिस सुबह माँ ने फैसला लिया, उसी दिन की शाम वो सदा के लिए अलविदा कहकर चली गई। जाना तो सब को है, लेकिन अच्छे लोगों के साथ समय कुछ ज्यादा ही गुजारने को मन करता है। माँ के जाने के बाद सब शहर आ गए, लेकिन मैं कमबख्त फिर शहर छोड़ आया, मुझे याद है, एक बार एक पंडित ने कहा था, इस लड़के के नसीब में घर में रहना लिखा ही नहीं। पंडित की बात बेघर होना, उस घर तक ही सीमित थी, या मेरे नए बसे घर पर भी लागू होती है मुझे नहीं पता, जिसमें मैं, मेरी बिटिया और उसकी माँ रहते हैं।
शुक्रवार, अप्रैल 09, 2010
उस दिन का पागलपन
दो बजने में कुछ मिनट बाकी थे, और स्कूल की छुट्टी वाली घंटी बजने वाली थी, लेकिन हम दूसरे गाँव से पढ़ने आते थे, इसलिए हमारे लिए स्कूल की घंटी बजने से ज्यादा महत्वपूर्ण था बस का हॉर्न। उस दिन जैसे ही बस ने गाँव के दूसरे बस स्टॉप से हॉर्न दिया, तो हमारे गाँव के सब लड़के स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ दौड़ने लगे। मेरे गाँव के सब लड़के स्कूल की दीवार के उस पार खड़े मुझे आवाज दे रहे थे, ओए पंडता (पंडित) जल्दी आ, बस आने वाली है, लेकिन मैं और मेजर फँसे खड़े सौ के करीब लड़कों की भीड़ में। पंगा पड़ा हुआ था, एक लड़की को लेकर, जो इस स्कूल में पढ़ने के लिए आई थी, दूसरे किसी शहर से, लेकिन उसके शहरीपन ने स्कूल का माहौल बिगाड़ दिया, अब हर कोई प्यार इश्क की बातें करने लगा, लड़कियाँ लड़कों से फ्रेंडशिप करने के बारे में सोचने लगी। बस गलती इतनी सी थी मेजर की, वो दोस्त के कहने में आ गया और सोचने लगा वो लड़की उस पर मरती है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि मैं उससे स्पष्ट शब्दों में पूछ चुका था। सुंदर लड़की पर कौन नहीं मरना चाहेगा, पूरा स्कूल उसकी तरफ देखता था, मैं नहीं मेरी निगाहें कहीं और थी।
अब जैसे स्कूल में पता चला कि मेजर उस लड़की पर लाईन लगाता है, तो उस गाँव के सब लड़के सख्ते में आ गए। और उन्होंने मेजर को स्कूल में पीटने का प्लान बना लिया। मेरे सब दोस्तों को पहले पता चल गया था, वो सब के सब तो स्कूल के पिछले रास्ते से निकल बस स्टॉप पर पहुंचकर मुझे आवाज दे रहे थे, लेकिन मैं मेजर को स्कूल के बरामदों से बस स्टॉप की तरफ खींचकर ले जा रहा था, वो लड़कों की भीड़ देखकर घबरा रहा था, पैर पीछे खींच रहा था, लेकिन मेरा मन उसको अकेले छोड़ भाग जाने को नहीं करा, मैंने कहा मैं भी तो तेरे साथ चल रहा हूँ, तू क्यों डर रहा है, तुझे रोज इस स्कूल में आना है, अगर तू डरेगा तो ये लोग तुम्हें घर में घूसकर मारेंगे, तू डर मत मेरी बाजू पकड़, मैं देखता हूँ कौन रोकता है रास्ता।
सौ के करीब लड़कों की भीड़ मुख्य द्वार और बरामदे के बीच वाले रास्ते पर खड़ी थी, जैसे ही हमने कदम बरामदे से बाहर निकाले, वो सबके सब मारने के लिए अपने हाथ को तनने लगे, वो किसी भी समय हम पर हमला कर सकते थे, लेकिन मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ा, अब हम दोनों को लड़कों ने चारों ओर से घेर लिया था। एक लड़के ने मुट्ठी बंद कर जैसे ही मेरे गुप्तअंग की तरह प्रहार करने की कोशिश की, तो एक पीछे से आई आवाज ने उसकी मुट्ठी को वहाँ ही रोक दिया। "पंडतां दा मुंडा ए, देखके मारी" (पंडितों का लड़का है, देखकर मारना)। इस पंक्ति ने सबको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, और मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ता गया, और हम स्कूल के द्वार के बाहर निकल गए, कुछ देर में उधर से बस भी आ गई, हम दौड़कर बस की छत्त पर चढ़ गए। मेरे दोस्तों ने कहा, ओए पंडता तू बच गया, आज तेरे साथ बहुत बुरा होता, तुम्हें सन्नी देओल बनने की क्या जरूरत थी। इतना सुनते ही जब मैं उस दृश्य को ख्याल में देखा तो सच मानो, मेरे पैरों तले जमीं निकल गई, अगर कुछ हो जाता तो?
अब जैसे स्कूल में पता चला कि मेजर उस लड़की पर लाईन लगाता है, तो उस गाँव के सब लड़के सख्ते में आ गए। और उन्होंने मेजर को स्कूल में पीटने का प्लान बना लिया। मेरे सब दोस्तों को पहले पता चल गया था, वो सब के सब तो स्कूल के पिछले रास्ते से निकल बस स्टॉप पर पहुंचकर मुझे आवाज दे रहे थे, लेकिन मैं मेजर को स्कूल के बरामदों से बस स्टॉप की तरफ खींचकर ले जा रहा था, वो लड़कों की भीड़ देखकर घबरा रहा था, पैर पीछे खींच रहा था, लेकिन मेरा मन उसको अकेले छोड़ भाग जाने को नहीं करा, मैंने कहा मैं भी तो तेरे साथ चल रहा हूँ, तू क्यों डर रहा है, तुझे रोज इस स्कूल में आना है, अगर तू डरेगा तो ये लोग तुम्हें घर में घूसकर मारेंगे, तू डर मत मेरी बाजू पकड़, मैं देखता हूँ कौन रोकता है रास्ता।
सौ के करीब लड़कों की भीड़ मुख्य द्वार और बरामदे के बीच वाले रास्ते पर खड़ी थी, जैसे ही हमने कदम बरामदे से बाहर निकाले, वो सबके सब मारने के लिए अपने हाथ को तनने लगे, वो किसी भी समय हम पर हमला कर सकते थे, लेकिन मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ा, अब हम दोनों को लड़कों ने चारों ओर से घेर लिया था। एक लड़के ने मुट्ठी बंद कर जैसे ही मेरे गुप्तअंग की तरह प्रहार करने की कोशिश की, तो एक पीछे से आई आवाज ने उसकी मुट्ठी को वहाँ ही रोक दिया। "पंडतां दा मुंडा ए, देखके मारी" (पंडितों का लड़का है, देखकर मारना)। इस पंक्ति ने सबको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, और मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ता गया, और हम स्कूल के द्वार के बाहर निकल गए, कुछ देर में उधर से बस भी आ गई, हम दौड़कर बस की छत्त पर चढ़ गए। मेरे दोस्तों ने कहा, ओए पंडता तू बच गया, आज तेरे साथ बहुत बुरा होता, तुम्हें सन्नी देओल बनने की क्या जरूरत थी। इतना सुनते ही जब मैं उस दृश्य को ख्याल में देखा तो सच मानो, मेरे पैरों तले जमीं निकल गई, अगर कुछ हो जाता तो?
शुक्रवार, मार्च 19, 2010
स्लैमबुक और उसकी मानसिकता
कुछ दिन पहले बठिंडा से मेरे घर अतिथि आए थे, वो मेरे खास अपने ही थे, लेकिन अतिथि इसलिए क्योंकि वो मुझे पहले सूचना दिए बगैर आए थे, और कमबख्त इस शहर में कौएं भी नहीं, जो अतिथि के आने का संदेश मुंढेर पर आकर सुना जाएं। वो आए भी, उस वक्त जब मैं बिस्तर में था, अगर खाना बना रहा होता तो शायद प्रांत (आटा गूँदने का बर्तन) में से आटा तिड़क कर बाहर गिर जाता तो पता चल जाता कोई आने को है।
शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010
जब हुआ नाड़ी निरीक्षण
गत 17 फरवरी से योग शिविर जा रहा हूँ, एक दोस्त के निवेदन पर, ताकि दोस्ती भी रह जाए और सेहत में भी सुधार हो जाए। योग शिविर में जाकर बहुत मजा आ रहा है, क्योंकि वहाँ पर बच्चा बनने की आजादी है, जोर जोर से हँसने की आजादी है, वहाँ पर बंदर उछल कूद करने की आजादी है। सुना तो बहुत बार है कि मानव रूपी पुतला पाँच तत्व से बना है,
सोमवार, फ़रवरी 15, 2010
जो हूँ वैसा रहना
मैं कल से क्यों नहीं डरता? मैं कल के बारे में क्यों नहीं सोचता? मेरी पत्नि अक्सर मुझ पर चिल्लाती है| चिल्लाए भी क्यों न वो, कल से जो डरती है, जिसके चक्कर में वो आज भी खो बैठती है। मुझे नहीं पता चला कब और कैसे मुझे आज से नहीं अब से प्यार हो गया। जो हूँ वैसा रहना मुझे पसंद है, चाहे सामने वाले को कितना ही बुरा क्यों न लगे। मुझे पल पल रूप बदलना नहीं आता। मैंने कहीं सुनना था या पढ़ा था सच और तलवार का घाव जल्द ठीक हो जाता है। उसके बाद झूठ का पल्लू पकड़ना बंद कर दिया, जबकि दुनियादारी झूठ के बगैर चलती नहीं।
शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010
कीचड़ में खेलता वो मासूम सा बच्चा
एक फूल सा बच्चा, गली में खड़े पानी के कारण हुए कीचड़ के बीचोबीच मस्ती कर रहा है। उसको कितना आनंद महसूस हो रहा था, उसका तो अंदाजा नहीं लगा पाऊंगा। हाँ, लेकिन उसके चेहरे की खुशी मेरे दिल को अद्भुत सुकून दे रही थी।
मंगलवार, जनवरी 19, 2010
जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया
मेरी आदत है कि कहीं से कोई भी सामान खरीदने से पहले अपना पर्स जरूर चैक करता हूँ, क्योंकि मेरी जेब में पैसे बच जाए, मानो बिल्ली के पास दूध। हाँ, जब कभी ऐसा करने में चूक जाऊं या फिर मुश्किल में फँस जाऊं तो माँ की दुआ ही बचाती है। सच में माँ की दुआओं में बहुत शक्ति होती है। मैंने तो उस शक्ति को हर पल महसूस किया है। बात है कल दोपहर की, जब मैंने दफतर की कैंटीन से हर रोज की तरह खाना मंगवाया। खाना आ गया, और खा भी लिया बड़े शौक से, लेकिन अब पैसे देने की बारी आई तो पर्स में से केवल पाँच पाँच के दो मरियल से नोट निकले, और बाकी सब नोट बड़े। अब कैंटीन वाले को देने थे 15 रुपए, मेरे पास खुले केवल दस रुपए। मैंने कैंटीन मालक से दस रुपए देते हुए कहा कि बाकी के पाँच रुपए शाम तक भेजवाता हूँ, वो जानता था कि पैसे आ जाएंगे, कहीं नहीं जाएंगे। अब वहां से उसका अहसान लेकर ऑफिस में आ गया। फिर शुरू हो गई कीबोर्ड की धुनाई, जैसे धोबी कपड़ों की और लुहार लोहे की धुनाई करता है। उंगलियों ने चलना धीमा कर दिया, मतलब कहने लगी हों कि अब बस थोड़ा सा आराम ले लेने दो। मैंने उंगलियों की थकावट को दूर दौड़ाने के लिए, उनसे कसरत करवाई। इतने में मेरा हाथ मेरी छाती पर आ गया। और उसने कुर्ते की ऊपर वाली जेब में एक कागज के होने का अहसास महसूस किया, मेरे दिमाग के हुकम पर उंगलियाँ मेरी जेब के भीतर घुस गई, वहां से एक कागज निकला, लेकिन ये कागज नहीं था, बल्कि दस का नोट था। जो धुलाई के बाद गुचपुच हो गया था। उस नोट को देखते ही माँ याद आ गई। माँ की दुआ याद आ गई। मैं कभी नहीं भूला कि एक दफा माँ ने कहा था कि तुम पैसे रख रख भूलोगे। सच में ऐसा मेरे साथ कई दफा हुआ, मैं कपड़ों में पैसे रखकर भूल गया, और बुरे वक्त पर वो ही पैसे मेरे काम आए, सच कहूँ तो डूबते को तिनके का सहारा मिल जाता है। जैसे किसी खिलौने को देखकर बचपन की याद ताजा हो जाती है, वैसे ही माँ की कही कोई बात सामने आते ही, माँ के दर्शन हो जाते हैं। वो कई साल पहले इस दुनिया से तो विदा हो गई, लेकिन अपने बेटे के साथ वो कदम दर कदम आज भी चलती है। वो माँ की गोद ही है, जहाँ जाकर हर डर गायब हो जाता है। सच कहूँ।
मुझे जब कभी डर लगा,
मैंने माँ की गोद में सर रख लिया।
डर छूमंत्र हुआ पल में
जब माँ ने सर पर हाथ रख दिया।।
मुझे जब कभी डर लगा,
मैंने माँ की गोद में सर रख लिया।
डर छूमंत्र हुआ पल में
जब माँ ने सर पर हाथ रख दिया।।
रविवार, जनवरी 10, 2010
जब प्यार हुआ मुझे
यही दिन थे (मई-जून), वेबदुनिया में आए अभी छ: महीने हुए थे। घर से कभी बाहर नहीं निकला था, इसलिए इन दिनों मैंने वेबदुनिया छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन कहते हैं ना कि समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसकी को कुछ नहीं मिलता, ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ, मुझे भी मेरे शहर वापिस जाना नहीं मिला, और इंदौर का होकर रह गया, पता नहीं कितने समय के लिए। हां, अगर उस वक्त मेरे प्रोजेक्ट लीडर मुझे न रोकते तो शायद में आज आपके सामने यह बातें पेश न कर पाता। मुझे पैसे ने नहीं बल्कि उनके स्नेह ने रुकने के लिए मजबूर किया।
मैं आम दिनों की तरह अगले दिन ऑफिस में आया, और उसी पुराने अंदाज में सबको नमस्ते, सत श्री अकाल, नमस्कार और गुड मार्निंग कहा, मुझे नहीं मालूम था कि मेरा यह स्टाइल किसका दिल चुरा लेगा, वेबदुनिया ने उन दिनों कई भाषाओं में पोर्टल शुरू किए थे, जिसके चलते नए नए चेहरों की भर्ती हो रही थी, इनमें एक चेहरा था, जो मेरे राज्य से न था, जो मेरी मां बोली को नहीं बोल सकता था, और नाहीं मैं उसकी भाषा और उसके राज्य से पराचित था। पर कहते हैं प्यार की कोई भाषा नहीं होती, जब दिल मिलते हैं तो सब फासले खत्म हो जाते हैं।
मेरी उसके साथ बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी, केवल नमस्ते और गुडमार्निंग बुलाने के सिवाय, हां कभी कभी जब वो ज्यादा काम में व्यस्त होती थी तो मैं इतना जरूर कहता था, क्या हुआ गुजारतन आज ज्यादा ही व्यस्त हो, इसके अलावा शायद हमारी एक ढाबे पर काफी लम्बी बातचीत हुई थी, तब दोनों की बीच में ऐसा कुछ नही था। बस रिश्ता था तो एक साथ कंपनी में काम करते हैं। मैं उन दिनों प्यार करने से कतराता था, क्योंकि घर में बापू की लठ से डर लगता था, क्योंकि वह अक्सर कहते थे, हैप्पी तू अपनी मर्जी से दुल्हन लेकर आएगा, और मेरी तेरी उस दिन लठ से पिटाई करूंगा, वो मुझे बहुत स्नेह करते थे, मैं भी उनसे। मगर मैं कहता था, जिस लड़की को मेरी मां चुनेगी, वो ही मेरी दुल्हन होगी, क्योंकि मैं अपनी मां से बेहद प्यार करता था और करता हूं।
मेरी बातों का किला उस समय ढह गया, जब मैं एक रात आफिस से काम कर रात के बारह बजे घर की तरफ अपनी मस्ती में गीत गाते हुए अकेला जा रहा था, ऐसे में अचानक मेरे मोबाइल पर एक अनजाने से नम्बर से एक मैसेज आया, मैंने दिमाग की सारी जासूसी इंद्रियां दौड़ाई, मगर मुझे याद नहीं आया कि यह नम्बर किसका है, मैंने मैसेज रिटर्न कर पूछा 'हू', तो आगे से जवाब आया लड़की, मुझे लगा कोई मेरा दोस्त मुझे बना रहा है, उसके रोमांटिक मैसेज लगातार आते रहे है, मैंने उसको कहा, अब मुझे सोने दो, सब मैसेज भेजना, क्योंकि मैं ठहरा आफिस प्रेमी और अगले दिन जल्दी आफिस आना था। उसने मेरी बात मान ली।
मगर अगले दिन फिर उसके हैरत में डालने वाले मैसेज आए, और मैं तंग परेशान हो रहा था, सब की मुसीबतें हल करने के लिए आगे रहने वाला हैप्पी आज खुद मुसीबत में था, इतने में मैंने वो मैसेज अपने एक अन्य दोस्त को दिखाया तो उसकी अकल के घोड़े दौड़े, उसने फटाक से कहा कि यह तो किसी गुजराती ने भेजा है, वो लड़की अब भी मेरे जेहन में न थी, मैं अब भी अपने गुजराती दोस्त परुण पर शक कर रहा था, लेकिन दिन गुजारते जैसे ही रात हुई तो तंग करने वाले का पर्दाफाश हुआ, मैंने फोन लगाया, तो आवाज मेरी पहचान में आ गई, हंसते हंसते मैंने उससे पूछा, तुम क्यों मुझे तंग कर रही हो, क्या चाहती हो? तो आगे से जवाब हंसते हंसते आया कुछ नहीं, बस दोनों ने काफी समय तक बात की और वो लड़की मेरे प्यार के मक्कड़जाल में फंस गई, प्यार हुआ और कुछ महीनों के बाद शादी हुई, हमने घरवालों को बिना बताए दोस्तों की मदद से शादी कर ली, जब इस बात का खुलासा हुआ तो दोनों घरों में खलबली मच गई, इसके बाद हमारी प्रेम कहानी में ट्विस्ट आ गया, उसके बाद जो हुआ आपको फिर कभी बताऊंगा, जब मैं जोश में लिखने के मूड मैं हुआ।। तब तक के लिए मुझे इजाजत दें।।
मैं आम दिनों की तरह अगले दिन ऑफिस में आया, और उसी पुराने अंदाज में सबको नमस्ते, सत श्री अकाल, नमस्कार और गुड मार्निंग कहा, मुझे नहीं मालूम था कि मेरा यह स्टाइल किसका दिल चुरा लेगा, वेबदुनिया ने उन दिनों कई भाषाओं में पोर्टल शुरू किए थे, जिसके चलते नए नए चेहरों की भर्ती हो रही थी, इनमें एक चेहरा था, जो मेरे राज्य से न था, जो मेरी मां बोली को नहीं बोल सकता था, और नाहीं मैं उसकी भाषा और उसके राज्य से पराचित था। पर कहते हैं प्यार की कोई भाषा नहीं होती, जब दिल मिलते हैं तो सब फासले खत्म हो जाते हैं।
मेरी उसके साथ बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी, केवल नमस्ते और गुडमार्निंग बुलाने के सिवाय, हां कभी कभी जब वो ज्यादा काम में व्यस्त होती थी तो मैं इतना जरूर कहता था, क्या हुआ गुजारतन आज ज्यादा ही व्यस्त हो, इसके अलावा शायद हमारी एक ढाबे पर काफी लम्बी बातचीत हुई थी, तब दोनों की बीच में ऐसा कुछ नही था। बस रिश्ता था तो एक साथ कंपनी में काम करते हैं। मैं उन दिनों प्यार करने से कतराता था, क्योंकि घर में बापू की लठ से डर लगता था, क्योंकि वह अक्सर कहते थे, हैप्पी तू अपनी मर्जी से दुल्हन लेकर आएगा, और मेरी तेरी उस दिन लठ से पिटाई करूंगा, वो मुझे बहुत स्नेह करते थे, मैं भी उनसे। मगर मैं कहता था, जिस लड़की को मेरी मां चुनेगी, वो ही मेरी दुल्हन होगी, क्योंकि मैं अपनी मां से बेहद प्यार करता था और करता हूं।
मेरी बातों का किला उस समय ढह गया, जब मैं एक रात आफिस से काम कर रात के बारह बजे घर की तरफ अपनी मस्ती में गीत गाते हुए अकेला जा रहा था, ऐसे में अचानक मेरे मोबाइल पर एक अनजाने से नम्बर से एक मैसेज आया, मैंने दिमाग की सारी जासूसी इंद्रियां दौड़ाई, मगर मुझे याद नहीं आया कि यह नम्बर किसका है, मैंने मैसेज रिटर्न कर पूछा 'हू', तो आगे से जवाब आया लड़की, मुझे लगा कोई मेरा दोस्त मुझे बना रहा है, उसके रोमांटिक मैसेज लगातार आते रहे है, मैंने उसको कहा, अब मुझे सोने दो, सब मैसेज भेजना, क्योंकि मैं ठहरा आफिस प्रेमी और अगले दिन जल्दी आफिस आना था। उसने मेरी बात मान ली।
मगर अगले दिन फिर उसके हैरत में डालने वाले मैसेज आए, और मैं तंग परेशान हो रहा था, सब की मुसीबतें हल करने के लिए आगे रहने वाला हैप्पी आज खुद मुसीबत में था, इतने में मैंने वो मैसेज अपने एक अन्य दोस्त को दिखाया तो उसकी अकल के घोड़े दौड़े, उसने फटाक से कहा कि यह तो किसी गुजराती ने भेजा है, वो लड़की अब भी मेरे जेहन में न थी, मैं अब भी अपने गुजराती दोस्त परुण पर शक कर रहा था, लेकिन दिन गुजारते जैसे ही रात हुई तो तंग करने वाले का पर्दाफाश हुआ, मैंने फोन लगाया, तो आवाज मेरी पहचान में आ गई, हंसते हंसते मैंने उससे पूछा, तुम क्यों मुझे तंग कर रही हो, क्या चाहती हो? तो आगे से जवाब हंसते हंसते आया कुछ नहीं, बस दोनों ने काफी समय तक बात की और वो लड़की मेरे प्यार के मक्कड़जाल में फंस गई, प्यार हुआ और कुछ महीनों के बाद शादी हुई, हमने घरवालों को बिना बताए दोस्तों की मदद से शादी कर ली, जब इस बात का खुलासा हुआ तो दोनों घरों में खलबली मच गई, इसके बाद हमारी प्रेम कहानी में ट्विस्ट आ गया, उसके बाद जो हुआ आपको फिर कभी बताऊंगा, जब मैं जोश में लिखने के मूड मैं हुआ।। तब तक के लिए मुझे इजाजत दें।।
रविवार, जनवरी 03, 2010
इम्तिहानों के दिन और फिल्म चस्का
बचपन गुजर चुका था, और हम किशोर अवस्था से युवास्था की तरफ दिन प्रति दिन कदम बढाते जा रहे थे। ये उन्हीं दिनों की बात है। हम सब दोस्त एक कमरे में बैठकर इम्तिहानों के दिनों में पढ़ाई करते थे। पढ़ाई तो बहाना होती थी सच पूछो तो मौज मस्ती करते थे। कभी दलजिंदर के चौबारे में तो कभी कलविंदर की बैठक में...रोज रात को पढ़ाई के बहाने महफिल जमती थी। वो जट्ट सिख परिवार से संबंध थे और उन सब के बीच मैं एक पंडितों के परिवार से होता था। हम हैं पंडित, लेकिन रहनी सहनी (जीवनशैली) बिल्कुल जट्टों जैसी है। जट्ट परिवार से संबंधित जितने भी दोस्त थे, वो पढ़ने लिखने में तो बिल्कुल नालायक.. उनके मन में एक बात घर कर चुकी थी कि जट्ट पुत्र तो खेतों के लिए बने हुए और उनको डिप्टी कमिश्नर तहसीलदार तो बनना नहीं। मेरा परिवार गरीब था, इसलिए मुझे किसी न किसी तरह पढ़ाई पूरी कर नौकरी हासिल करनी थी। इसलिए उन सब में सबसे ज्यादा नम्बर लाने वाला मैं ही होता था, वो सब के सब नक्लची।
सोमवार, दिसंबर 21, 2009
शौचालय और बेसुध मैं
मुझे वो दिन कभी नहीं भूलता। उस दिन मैं काम कर कर बेसुध हो चुका था। मेरा शरीर गतीविधि कर रहा था, जबकि मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न हो चुका था, क्योंकि काम कर कर दिमाग इतना थक चूका था कि उसमें और काम करने की हिम्मत न थी। मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी, और टहलने के लिए नीचे के फ्लोर पर चला गया, जहां चाय और कॉफी बनाने वाली मशीन लगी हुई थी। मैंने एक कप चाय ली, और घुस गया साथ वाले रूम में, जो बिल्कुल खाली था। सोचा कि एकांत है, कुछ समय यहां पर रहूंगा तो तारोताजा हो जाऊंगा। मैंने चाय का कप एक टेबल पर रखा, और पेसाब करने के लिए बाथरूम में चला गया।
शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009
मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स
कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्थित एक किताब स्टॉल पर गई, मैं तुरंत उसकी तरफ हो लिया, जब पत्नी साथ होती है तब मैं खाने पीने के अलावा शायद किसी और वस्तु पर पैसे खर्च कर सकता हूं, इसलिए हर यात्रा के दौरान मुझे किताबें या मैगजीन खरीदने का शौक है। इस बार मैंने अपने इस सफर के लिए 'आह!जिन्दगी' को चुना, मैंने जब उसको खोला तो मैं सबसे पहले उस लेख पर गया, जो महान फुटबाल खिलाड़ी माराडोना पर लिखा गया था, इसको लेख को पढ़ते हुए मुझे मेरे पिता का अतीत याद आ गया, उनका संघर्ष याद आ गया।
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शुक्रवार, अक्टूबर 23, 2009
महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण-पार्ट-2
आज वो बैंक भी बदल गया और मेरा बैंक खाता भी। वो बैंक अब एचडीएफसी हो गया जो कभी बैंक ऑफ पंजाब हुआ करता था, मेरा खाता भी अब इस बैंक में आ गया। वो वाला नहीं नया बैंक खाता, वो तो बहुत पहले ही बंद हो गया था, लेकिन वो पहला बैंक खाता मुझे आज भी याद है। उस बैंक में चैक लगाने और पैसे निकलवाने के लिए जाना। कतार में लगना, उस मैडम को देखना, जो मुझे कतार में लगे हुए देखती। कभी कभी कैश काउंटर पर वो भी आ जाती, बस उस दिन काम थोड़ा जल्दी हो जाता..आम दिनों के मुकाबले।
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