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शुक्रवार, मई 07, 2010

लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।

गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। जब गाँव से निकला था, बड़ी मुश्किल से 18 साल का हूँगा। माँ ने रोका था, मत जा शहर अभी तुम बहुत छोटे हो। अभी तुम हमारे साथ यहाँ रहो। शहर में बहुत भीड़ भाड़ है। तुमको अंधेरे से डर लगता है। अभी तुम पढ़ाई करो। नौकरी नाकरी बाद में कर लेना, लेकिन गाँव में रहने के लिए कुछ न था, किसके भरोसे रहता। वो माँ भी जानती थी, लेकिन माँ तो आखिर माँ होती है। वो कैसे अपने जिगर के टुकड़े को कुछ कागज के टुकड़ों के लिए आँखों से ओझल कर दे। गाँव छोड़ने के बाद मेरी स्थिति शादी कर चली गई लड़की जैसी हो गई, जो ससुराल में इतनी व्यस्त हो गई कि मायके में बस कभी कभार कुछ पलों के लिए ही आना होता है। माँ की दवाई लेकर जाना, गाँव जाने का एक मात्र बहाना हो गया था, इसके अलावा कुछ नहीं। बस माँ के दर्शन किए, दवाई थमाई, और हालचाल पूछा नहीं कि बस ने गाँव के दूसरे बस स्टेंड से हॉर्न बजा दिया, जैसे कह रही हो प्लीज हरी! अप। जो माँ मेरे लिए बनाती वो घर में बहन के लिए ही छूट जाता, वो बीमार थी, लेकिन बेटे के आने की बात सुनते ही तंदरुस्त हो उठी, पता नहीं क्या ऊर्जा थी बेटे के आने की खबर में, और मैं भागती जिन्दगी में सोच ही नहीं पाया कि जिन्दगी हमारी मुट्ठी में भरी रेत की तरह कण कण होकर फिसल रही है। जिन्दगी एक सफर है, इसको कहीं न कहीं तो खत्म होना है, शायद किसी का पहले और किसी का बाद में। माँ बीमार थी, लेकिन फिर भी जब मैं शहर से फोन लगाता तो माँ सबसे पहले मेरा हाल पूछती, जबकि हाल तो मुझे पूछना होता था उसका। उस समय मेरे घर में एक भी फोन नहीं थी, लेकिन आज वो नहीं तो घर में तीन तीन फोन हैं, घर का अलग, भाई का अलग और पिता का। वो दंग रह जाती जब मैं उसको बताता कि मैं ऑफिस में से बहुत देर रात निकलता हूँ घर के लिए, क्योंकि वो जानती थी मैं अंधेरे से बहुत डरता था, इतना कि पेशाब करने के लिए भी रात को रोशनी से परे एक कदम भी नहीं उठाता था। फिर पूछती खाना पीना तो अच्छा है, हाँ तेरी मौसी बता रही थी कि तुम दिन में एक बार खाना खाने लग गए हो, तो मैं कहता नहीं नहीं बाज़ार से कुछ खा लेता हूँ। कैसे कहता कि माँ मुझे रोटियाँ अच्छी नहीं लगती। गाँव में दिन की 27 रोटियाँ तोड़ने वाला शहर की भाग दौड़ में सिर्फ पाँच छ: रोटियों पर आ गया है। उसको कैसे बताऊं कि शहर आकर जाना है मैंने रोटियाँ गिनकर बनाई जाती हैं, तेरी तरह नहीं कि रोटियों से छाबा (रोटियाँ रखने वाला स्तूत की लड़की से बना डिब्बा) भरकर रख दो, जब चाहे मेरे बच्चों का मन करे खा लें। बेटे से दूर गाँव में रहना अब मुश्किल हो रहा था, शायद इसलिए एक दिन उसने फैसला किया कि अब वो शहर रहेगी, शहर की फिजाओं को माँ का फैसला ठीक न लगा, और जिस सुबह माँ ने फैसला लिया, उसी दिन की शाम वो सदा के लिए अलविदा कहकर चली गई। जाना तो सब को है, लेकिन अच्छे लोगों के साथ समय कुछ ज्यादा ही गुजारने को मन करता है। माँ के जाने के बाद सब शहर आ गए, लेकिन मैं कमबख्त फिर शहर छोड़ आया, मुझे याद है, एक बार एक पंडित ने कहा था, इस लड़के के नसीब में घर में रहना लिखा ही नहीं। पंडित की बात बेघर होना, उस घर तक ही सीमित थी, या मेरे नए बसे घर पर भी लागू होती है मुझे नहीं पता, जिसमें मैं, मेरी बिटिया और उसकी माँ रहते हैं।

मंगलवार, जनवरी 19, 2010

जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया

मेरी आदत है कि कहीं से कोई भी सामान खरीदने से पहले अपना पर्स जरूर चैक करता हूँ, क्योंकि मेरी जेब में पैसे बच जाए, मानो बिल्ली के पास दूध। हाँ, जब कभी ऐसा करने में चूक जाऊं या फिर मुश्किल में फँस जाऊं तो माँ की दुआ ही बचाती है। सच में माँ की दुआओं में बहुत शक्ति होती है। मैंने तो उस शक्ति को हर पल महसूस किया है। बात है कल दोपहर की, जब मैंने दफतर की कैंटीन से हर रोज की तरह खाना मंगवाया। खाना आ गया, और खा भी लिया बड़े शौक से, लेकिन अब पैसे देने की बारी आई तो पर्स में से केवल पाँच पाँच के दो मरियल से नोट निकले, और बाकी सब नोट बड़े। अब कैंटीन वाले को देने थे 15 रुपए, मेरे पास खुले केवल दस रुपए। मैंने कैंटीन मालक से दस रुपए देते हुए कहा कि बाकी के पाँच रुपए शाम तक भेजवाता हूँ, वो जानता था कि पैसे आ जाएंगे, कहीं नहीं जाएंगे। अब वहां से उसका अहसान लेकर ऑफिस में आ गया। फिर शुरू हो गई कीबोर्ड की धुनाई, जैसे धोबी कपड़ों की और लुहार लोहे की धुनाई करता है। उंगलियों ने चलना धीमा कर दिया, मतलब कहने लगी हों कि अब बस थोड़ा सा आराम ले लेने दो। मैंने उंगलियों की थकावट को दूर दौड़ाने के लिए, उनसे कसरत करवाई। इतने में मेरा हाथ मेरी छाती पर आ गया। और उसने कुर्ते की ऊपर वाली जेब में एक कागज के होने का अहसास महसूस किया, मेरे दिमाग के हुकम पर उंगलियाँ मेरी जेब के भीतर घुस गई, वहां से एक कागज निकला, लेकिन ये कागज नहीं था, बल्कि दस का नोट था। जो धुलाई के बाद गुचपुच हो गया था। उस नोट को देखते ही माँ याद आ गई। माँ की दुआ याद आ गई। मैं कभी नहीं भूला कि एक दफा माँ ने कहा था कि तुम पैसे रख रख भूलोगे। सच में ऐसा मेरे साथ कई दफा हुआ, मैं कपड़ों में पैसे रखकर भूल गया, और बुरे वक्त पर वो ही पैसे मेरे काम आए, सच कहूँ तो डूबते को तिनके का सहारा मिल जाता है। जैसे किसी खिलौने को देखकर बचपन की याद ताजा हो जाती है, वैसे ही माँ की कही कोई बात सामने आते ही, माँ के दर्शन हो जाते हैं। वो कई साल पहले इस दुनिया से तो विदा हो गई, लेकिन अपने बेटे के साथ वो कदम दर कदम आज भी चलती है। वो माँ की गोद ही है, जहाँ जाकर हर डर गायब हो जाता है। सच कहूँ।

मुझे जब कभी डर लगा,
मैंने माँ की गोद में सर रख लिया।
डर छूमंत्र हुआ पल में
जब माँ ने सर पर हाथ रख दिया।।

शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स


कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्थित एक किताब स्टॉल पर गई, मैं तुरंत उसकी तरफ हो लिया, जब पत्नी साथ होती है तब मैं खाने पीने के अलावा शायद किसी और वस्तु पर पैसे खर्च कर सकता हूं, इसलिए हर यात्रा के दौरान मुझे किताबें या मैगजीन खरीदने का शौक है। इस बार मैंने अपने इस सफर के लिए 'आह!जिन्दगी' को चुना, मैंने जब उसको खोला तो मैं सबसे पहले उस लेख पर गया, जो महान फुटबाल खिलाड़ी माराडोना पर लिखा गया था, इसको लेख को पढ़ते हुए मुझे मेरे पिता का अतीत याद आ गया, उनका संघर्ष याद आ गया।

शुक्रवार, सितंबर 18, 2009

श्राद्ध खिलाने के लिए खिलाओ रिश्वत

आज मैंने भी अपनी मां का श्राद्ध पाया, लेकिन खुद ही घर में खाया। सचमुच! यकीन नहीं आता होगा न। मुझे भी यकीन नहीं आ रहा था क्योंकि मां को पूर्वजों की रोटी खिलाते हुए देखा, किसी गरीब घर के बच्चों या परिवारजनों को। आज मेरी पत्नी बोली हम किसी पंडित पंडितायन आदि को खिलाने की बजाय मंदिर बाहर बैठे हुए भूखे नंगे लोगों को श्राद्ध की रोटी खिलाएंगे ताकि मां खुश हो सके। आखिर होममिनिस्टर के आगे हमारी कहां चलती है, वो हड़ताल पर चली या अस्तीफा देकर चली गई तो अपनी तो नैया डुब जाएगी। मैंने कहा ठीक है, उसने पूरी और खीर बनाई। मुझे भरकर एक बर्तन में खीर दे दी। मैं और मेरा तेतेरा भाई खीर पूरी लेकर मंदिर पहुंचे। हम बांटने ही लगे कि वहां बच्चों की फौज लिए बैठी एक महिला बोली, ये नहीं खाएंगे, तुम पैसे दे सकते हो। मैंने बोला, चल किसी और को खिला देते हैं। वहां गया, उस महिला ने खीर पत्तल में डलवा तो ली, लेकिन खीर बाद में वहां पर ऐसे गिर रही थी जैसे गिलास से पानी। फिर मेरी नजर एक बुजुर्ग व्हील चेयर पर बैठे साधुनुमा व्यक्ति पर पड़ी, जब उसको मैंने पूछा बाबाजी पूरी खीर खाओगे। कोई जवाब नहीं आया। इतने में वहां एक और युवक आया और मेरी तरह ही बोला। बाबा ने उत्तर दिया, दक्षण दोगे, वो पहले तो चुप हो गया। फिर दुबकी आवाज में हां बोला। इधर, बाबा ने फटाक से उच्ची आवाज में कहा क्यों नहीं खाएंगे? पहले दक्षण हो जाए। मैं चकित रह गया। फिर मैंने सोचा शायद बाबा पहले किसी सरकारी दफ्तर में था, शायद इस लिए काम के लिए पहले रिश्वत मांग रहा है। अब तो श्राद्ध खिलाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।

रविवार, सितंबर 13, 2009

जब छोड़कर चली गई मां

मुझे आज भी याद है, वो काला दिन, जब मेरी मां ने सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर अपनी मां (मेरी नानी) की बांहों में दम तोड़ दिया था। उस दिन मेरी मौसी, मामी, मेरी नानी और मैं, गुलूकोज की बोतल का खत्म होने का इंतजार कर रहे थे, उस पर निर्भर था मेरी का मां जीवन। मेरी मां की तबीयत बहुत नाजुक थी, और डाक्टर ने सुबह उसको देखने के बाद मुझे बोल दिया था, हैप्पी अगर वो इस गुलूकोज की बोतल को पचा गई तो मैं उसको बचालूंगा। सबकी नजरें उस बोतल थी, और मेरी मां भी अब सुबह से बेहतर लग रही थी, उसके सिर के पास बैठी मेरी नानी कह रही थी, देख शिमला (मामी) कृष्णा के चेहरे पर पहले सा ताब नजर आ रहा है। मुझे यकीन है कि कृष्णा आज शाम तंदरुस्त होकर घर पहुंच जाएगी। वहां सब एक दूसरे का मन रख रहे थे, वैसे नानी के कहने अनुसार मेरी मां के चेहरे पर पहले जैसा ताब था, वो पहले से बेहतर होती नजर आ रही थी। और इधर गुलूकोज की बोतल खत्म होने पर ही थी।

उस सुबह की बात ही है, जब मैं ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, तो मेरी मां बोली। हैप्पी मेरी तबीयत खराब हो रही है, तुम मुझे आज सरकारी अस्पताल में दिखाकर आओ, मैंने कहा मां कल तो दवाई लेकर आए हैं, जिससे दवाई लाए थे वो बठिंडा का मशहूर जाना माना डाक्टर है। नहीं, हैप्पी मुझे तुम एक बार सिविल अस्पताल दिखा लाओ। वहां तुम्हारी जान पहचान के डाक्टर हैं, इलाज अच्छे से कर देंगे। मैंने कहा ठीक है। और वो आंखों में आंसू लेकर बोली, आज मुझे अपने घर छोड़ आना, जो हमने शहर में नया बनवाया था, गांव से शहर आने के लिए। मैं आज से वहां ही रहूंगी, तेरे पापा को गांव से आना हो या ना। लेकिन अब मैं गांव वापिस नहीं जाउंगी। मैंने कहा ठीक है।

मैं मां को लेकर अस्पताल पहुंचा, डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, इसको अस्पताल में दाखिल करना पड़ेगा, मैंने कहा ठीक है। अस्पताल में दाखिल होने की बात सुनकर अस्पताल में मेरी नानी, मामी और बुआ सब पहुंच गए, मैं और मौसी तो पहले से वहां पर थे। अब उसको गुलूकोज की बोतल लगाने की बात आई, तो वहां नर्स और अन्य डाक्टर हाजिर हो गए, किसी को मेरी मां के शरीर में नस नहीं मिल रही, वो जगह जगह सूईयां चुभ रहे थे, शायद यहां कोई नस मिल जाए। मैंने कभी मां को टीका लगता नहीं देखा, आज वो मेरे सामने उसके जिस्म में सूइयां चुभो चुभोकर देख रहे थे, जैसे किसी मुर्दे के शरीर में। मेरे मुंह से गाली निकल गई, डाक्टर मेरे जानकार थे, उन्होंने कहा हैप्पी तुम बाहर जाओ। आखिर डाक्टरों को नस मिली, वो भी टखने के उपर। अब मुझे थोड़ा सा सुकून आया।

बोतल आधी खत्म हो चुकी थी, और मेरी मां के चेहरे पर सुधार के संकेत साफ साफ नजर आ रहे थे। उसने कहा हैप्पी तुम परम (छोटी बहन) टैनी (बड़ा भाई) का रखना। उसने कहा मां पानी...मामी मौसी ने झट से नानी को पानी पकड़ा और मुंह में डालने लगी कि मेरी मां को अटैक आया, और दांत जुड़ गए। पानी की एक घुंट भी अंदर न गई। और सब खत्म हो गया। 28 फरवरी 2006 शाम पांच बजे मेरी माँ इस दुनिया को अलविदा बोलकर...और कुछ जिम्मेदारियां मेरे कंधों पर डोलकर चली गई।


शुक्रवार, अगस्त 21, 2009

खून से लथपथ पिता जब घर पहुंचे

सुबह के चार बजे घर का दरवाजा किसी द्वारा खटखटाने की आवाज आई और मेरी मां दरवाजे की तरफ दौड़ी, क्योंकि आधी रात के बाद से वो मेरे पिता का इंतजार कर रही थी, जिसको ढूँढने के लिए मेरे परिवार के सदस्य गए हुए थे। ऐसे में अगर हवा भी दरवाजा खटखटा देती तो भी स्वाभिक था कि मेरी मां दरवाजे की तरफ इसी तीव्र गती से दौड़ती क्योंकि अचानक मांग का सिंदूर कहीं चल जाए तो साँसें भी अटक अटक आती हैं। ऐसा ही कुछ हाल था मेरी मां का उस दिन। मेरी मां ने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा के खून से लथपथ एक व्यक्ति खड़ा है, ये व्यक्ति कोई और नहीं मेरे पिता जी थे। शहर की गलियां पानी से भरी हुई थी तो मेरे पिता के कपड़े रक्त से। मां पिता की ये स्थिति देखते ही दंग रह गई, जैसे पांव से जमीं छू मंत्र हो गई हो, गले से जुबां ही गायब हो गई हो। मेरी मां को लगा आज या तो ये कैसी को मौत के घाट उतारकर आएं हैं या फिर आज किसी ने इनके शरीर को हथियारों के प्रहार से छलनी कर दिया। बिन शोर मचाए चुपचाप बाजूओं के सहारे मेरी मां पिता को कमरे के भीतर ले आई, यहां मैं और मेरी छोटी बहन घोड़े बेचकर सोए हुए थे।

एक सोच पर प्रतिबंध कहां तक उचित ?

जब मेरी मां ने पिता का कुर्ता उतारा तो उसकी आंखें खुली की खुली रहेगी। गले में सांसें अटक गई। अब तो मां पत्थर में तब्दील हो चुकी थी, क्योंकि पिता के शरीर की हालत देखते किसी की भी वो हालत हो सकती थी, जो मेरी मां की हुई। पिता के जिस्म पर एक नहीं दस ग्यारह जोक चिमटे हुए थे, जो शरीर से जुदा हुए लोथड़ों की तरह प्रतीत हो रहे थे। जोक तो एक भी बुरी, क्योंकि जोक इंसान का पूरा खून पी जाती है और मेरे पिता के शरीर पर दर्जन भर जोकें थी। मेरी मां ने हिम्मत जुटाते हुए सभी जोकों को एक एक कर उतारा..और जख्मों पर हल्दी तेल में लिप्त रूई के गोले रखे। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसे मेरे पिता के साथ हुआ कैसे ?

बात कुछ इस तरह है कि उन दिनों हम बठिंडा शहर में रहते थे। हमारे पास ट्रैक्टर हुआ करता था जो ठेकेदारी के काम पर चलता था। और उन्हीं दिनों शहर में तीन से चार फुट तक पानी भर गया। शहर का पूरा जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया। हमारे लिए जनजीवन अस्त व्यस्त होना कोई मायने नहीं रखता था क्योंकि हम बच्चे तो बारिश के पानी में कागज की नाव छोड़कर उसके डुबने का मंजर देखते थे। शहर को पानी के चुंगल से निजात दिलाने के लिए हमारे ट्रैक्टर को भी अन्य ट्रैक्टरों के साथ शहर का पानी नहर में फेंकने के लिए नहर किनारे लगा दिया गया। जहां एक तरफ गहरे गहरे खतरनाक खतान तो दूसरी तरफ बहती नहर। बीच में हमारा ट्रैक्टर चल रहा था। रात का समय था, तो पिता जी को पीने का शौक था। उस रात भी उन्होंने पी ली..जिसके बाद पता नहीं क्या हुआ? वो वहां से निकल गए।

जब रात को उनको देखने उनका एक अन्य साथी वहां पहुंचा तो देखा कि ट्रैक्टर चल रहा है, मगर हेमा कहीं नजर नहीं आ रहा तो उसने काफी आवाजें लगाई। सामने से कोई उत्तर नहीं आया और चारों ओर पानी फैला हुआ था। ऐसे में उसको लगा कि हेमा कहीं पानी में बह गया, वो व्यक्ति घर की तरफ दौड़ा। उसने मेरी मां और पूरे परिवार की नींद उड़ा दी। सब मेरे पिता को ढूंढने के लिए निकल गए। वो कहां किसी को मिलने वाले थे, सब उनको तीन चार फुट पानी में पैदल चलकर ढूंढ रहे थे और वो पता नहीं कहां कहां से होते हुए घर पहुंच गए। पर उनके शरीर पर लगी जोकें बयान करती थी कि वो मौत को मात देखकर आएं और खतानों के बीच से आएं हैं। जब सुबह बिस्तर से पिता जी उठे तो बोले मुझे क्या हुआ और ट्रैक्टर के पास कौन है? मेरी मां गुस्से में थी, उसने उस वक्त को चटपटा जवाब दिया जो मैं भूल गया शायद।

रविवार, जून 21, 2009

माँ छांव तो बाप कड़ी धूप

जब भी पिता ने हमको मारने की कोशिश की, मां बीच में दीवार बन खड़ी हो गई। हमारे तन पर पड़ने वाली लठें उसने अपने तन पर सही। हमारे बचाव में जब भी मां उतरती तो पिता के मुँह पर एक बात होती थी कि 'माँ बिगाड़ती है और पिता संवारता था'। पिता के इन शब्दों से मैं कुछ हद तक सहमत हूं, अगर सिर पर पिता के डर का साया न हो तो शायद बच्चे उतनी सीमा में नहीं रहते जितनी में रहना चाहिए। मुझे लगता है कि माँ हमारे अनुकूल बनती है, जबकि पिता हमको समाज के अनुकूल बनता था। माँ हमारी हर गलती को छुपाती है, लेकिन पिता उन गलतियों को छापने के बजाय उन गलतियों को दोहराने से रोकता है। मुझसे पता है कि मेरे पिता का स्वभाव बहुत गर्म था, जो अब उतना नहीं। लेकिन माँ स्वभाव में बिल्कुल इसके विपरीत थी। हम पिता से इतना डरते थे कि अगर वो आते दिख जाते तो हम खेलना छोड़कर घर के भीतर चले जाते। ये भी उनके भय के कारण ही हुआ, जो हम बुरी संगत से दूर रहें, स्कूल से कोई शिकायत लेकर घर नहीं आए। किसी लड़की के पीछे नहीं गए, किसी को सीटी बजाकर छेड़ा नहीं। जब ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को टीचर पीटते हैं तो वो शिकायत लेकर घर नहीं आते, अगर आते हैं तो सिर्फ माँ को बताते हैं, क्योंकि उनको पता होता है कि पिता को बताया तो वो सीधा स्कूल जाएंगे, इस लिए नहीं कि टीचर ने उनकए बच्चे को क्यों पीटा, बल्कि इस लिए जाएंगे कि आपने इसको और अच्छे से क्यों नहीं पीटा। अगर पिता को दूसरे नजरिए से देखें तो कहूंगा कि अगर माँ प्यार का सागर है तो पिता क्रेडिट कार्ड है। जिसके बल पर ऐश करने का अपना ही मजा है। जब हम सब पुत्र होते हैं तो हमको बाप की डाँट फटकार बुरी लगती है और माँ का दुलार भाता है। मगर जब हम अपने पिता वाली जॉब पर आते हैं तो हम वो ही करते हैं, जो हमारे पिता करते थे। अपने बच्चे की गलतियों को सुधारना और उनको फिर से न दोहराने के सीख देना आदि। तब जब हमारी पत्नियाँ हमारी माँ वाली ड्यूटी निभाती हैं तो हमको बुरा लगता है। जिन्दगी में जितनी माँ की अहमियत है, उतनी ही पिता की। हमारा माँ से लगाव इस लिए ज्यादा रहता है क्योंकि वो हमारी गलतियों को माफ करती है, वो हमारे अनुकूल रहती है। जबकि असल में पिता खून पसीने की कमाई से हमें सफल इंसान बनाने के लिए दिन रात काम करता है, ये काम ही हमको उनके अधिक करीब नहीं आने देता। लेकिन सत्य तो ये है कि अगर माँ छांव है तो पिता एक कड़ी धूप, जो हमको हर स्थिति का सामना करने के लिए हमको कठोर बनाता है।

रविवार, मई 10, 2009

मां से तोड़ आया अनजाने में रिश्ता...

यारों मैं इतना बुरा भी नहीं कि मां की कदर न करूं, मैं भी आपकी तरह मां से बहुत प्यार करता हूं और करता था एवं करता रहूंगा. लेकिन एक दिन अनजाने में उस मां से रिश्ता तोड़ आया, जब मुझे मालूम हुआ तो मैं बहुत रोया. हुआ कुछ इस तरह कि आज से तीन साल पूर्व जब मेरी मां ने सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर दम तोड़ा, तो कुदरती था कि उसका अंतिम देह सस्कार किया जाए. मेरी मां की आर्थी शमां घाट पहुंची, उसकी चिता को अग्नि के हवाले कर दिया. उसके बाद एक रस्म होती है कि मरने वाले की चिता के पास कुछ डक्के (लकड़ी की तीलियां) बिखरे पड़े होते हैं, सब लोग उन डक्कों को चुगकर वहीं रामबाग में तोड़ देते हैं और फिर वहां से चल देते हैं. वहां सबको देखादेखी मैंने भी वैसे ही डक्का तोड़ दिया और चिता की अग्नि पर फेंक दिया. कुछ दिनों बाद जब मुझे उस रस्म के पीछे का अर्थ पता चला तो बहुत दुख हुआ, उसका मतलब होता है कि अब हमारा मरने वाले से कोई नाता नहीं, हम इस डक्के के साथ उस रिश्ते को भी तोड़ रहें है, जो तुम्हारा हम से था. मुझे इस बात का दुख है कि मैं उस मां से रिश्ता तोड़ आया, जिसने नौ माह मुझे पेट में रखा, कई सालों तक सीने से लगाकर सुलाया, अपने सीने का दूध पिलाकर बड़ा किया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया, मुझे बोलना सिखाया.बेशक उसकी हर बात मेरे साथ है, लेकिन उक्त बात का दुख मुझे हमेशा होता है, उस मैं उसके अंतिम सस्कार पर नहीं रोया, लेकिन वैसे याद कर अक्सर रोता हूं, अगर वो होती तो शायद ऐसा होता, घर जाता तो सीने से लगाती, प्यार करती, आंखों से वजन मापती..हाथों से खाना खिलाती...
ਹੁੰਦੇ ਨੇ ਦਿਲ ਦਰਿਆ ਮਾਂਵਾਂ ਦੇ