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शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014

कहीं किसी को चोट तो नहीं पहुंचा रहे

हम जाने आने में किसी के दिल को चोट पहुंचा देते हैं। हम को ध्यान रखना चाहिए। आपका दोस्त एक शानदार मोबाइल खरीदकर लाता है। आप उसको देखते ही तपाक से बोलते हैं। यह तुमने गलत किया। इस कंपनी का मोबाइल नहीं लेकर आना था। अचानक वो कहता है, मैंने बहुत देख व पूछ ताछ करने के बाद लिया है। सब का अनुभव अच्छा है।

हो सकता है कि हमारा अनुभव खराब रहा हो, लेकिन जब सामने वाला फैसला कर चुका हो तो हमको एक बात याद रखनी चाहिए कि उसके मन को केवल अगर अब कोई बदल सकता है तो केवल और केवल उसका अनुभव।

आप अधिक जोर देंगे। अगली आपकी सलाह तो क्या वो आपको अपनी चीज दिखाने से भी कतराएगा। दोस्त अच्छे के लिए होते हैं, लेकिन कभी कभी सामने वाले की मानसिकता को भी समझना भी जरूरी होता है।

इसको कुछ महत्वपूर्ण मामलों से जोड़कर न देखें। यह केवल बाजारी वस्तुओं पर लागू होने वाली बात है। कुछ मुद्दों पर तर्क वितर्क होना चाहिए। किसी भी कीमत पर।

बुधवार, अगस्त 22, 2012

जितेंद्र गोभीवाला- तेरी सर्कस ही अलहदा थी यार

मेरी और जितेंद्र गोभीवाला की पहली मुलाकात आज से करीबन दस पहले हुई थी, जब मैं गांव से बठिंडा शहर पहुंचकर दैनिक जागरण में अपने कैरियर की शुरूआत कर रहा था, और जितेंद्र गोभीवाला की कामेडी भरपूर कैसिट 'कट्टा चोरी हो गया' रिलीज हुई थी। वो छोटी सी मुलाकात, कुछ समय बाद एक अच्‍छी दोस्‍ती में बदल गई। उसका कारण एक ही था, जितेंद्र गोभीवाला का मिलनसार व्‍यवहार और हमारा दोनों का समाज सेवा से लगाव, और एक ही संस्‍था से जुड़ाव।

मैं मीडिया लाइन में नया था, और मीडिया वालों का एक टिकाना था 'मेहना चौंक' स्‍थित यूनाइटेड वेलफेयर सोसायटी का ऑफिस या तहसील। यहां पर जितेंद्र से कई बार मुलाकातें हुई। उसको करीब से जानने का मौका मिला। वो कलाकार बाद में पहले दोस्‍त था। कट्टा चोरी हो गया के बाद जितेंद्र गोभीवाला की दूसरी वीडियो सीडी आई लो कर लो गल्‍ल। अब जितेंद्र स्‍टेज शो छोड़कर अपने नए प्रोजेक्‍ट की तरफ बढ़ रहा था कि मुझे शहर छोड़ना पड़ा और उसको बीमारी ने अपनी जकड़ में ले लिया।

उसके बीमार होने की ख़बर मुझे मध्‍यप्रदेश में मिली तो दिल पीड़ा से तड़फ उठा। उसकी सलामती के लिए दुआ की। पिछले पांच छह सालों में एक वक्‍त तो ऐसा भी आया, जब लगता था कि अब जितेंद्र जाएगा हम को छोड़कर। मगर दुआओं ने अपना असर दिखाया, जितेंद्र गोभीवाला फिर से तंदरुस्‍त होने लगा। मगर बीमारी अंदर अंदर खा रही थी, पर चेहरे पे शिकन तक नहीं थी। बस जब भी मिलता हंसते हुए मिलता। मैं और जितेंद्र एक बार चैकअप के लिए चंडीगढ़ पीजीआई गए, वो पूरे सफर ऐसे मस्‍त मौला इंसान की तरह बातें करता हुआ गया जैसे वो मुझे सांत्‍वना दे रहा हो, और मानो वो बीमार नहीं, मैं बीमार हूं।

मेरी और उसकी अंतिम मुलाकात डेढ़ माह पूर्व उसकी बीबीवाला चौंक दुकान पर हुई, जहां पर पहले भी बहुत सी मुलाकातें हुई। इस बार वो काफी तंदरुस्‍त नजर आ रहा था। उसके चेहरे पर मुस्‍कान थी। उसने कहा, इस बार सर्कस पक्‍का लगाएंगे। सर्कस उसका तकियाकलाम था। मुझे नहीं पता था, दोस्‍त तू इस बार इतनी बड़ी सर्कस लगा जाएगा, वो भी बिना बताए।

कॉलेज में पढ़ाई करते हुए कामेडी का शौक पड़ गया और जसविंदर भल्‍ला को अपना गुरू धारण कर लिया। उनके सन्‍निध्‍य में उनके साथ जितेंद्र ने कई बार काम भी किया। जितेंद्र गोभीवाला की अंतिम वीडीसी लो कर लो गल्‍ल थी, मगर वो आगे के लिए कुछ संजो रहा था, लेकिन वो उस को दुनिया के सामने रखता कि भगवान ने उसको अपने पास बुला लिया। जिन्‍दगी के बुरे वक्‍त में भी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने परिवार और दोस्‍तों को उसी तरह दर्द छुपाकर हंसाता रहा, जैसे एक कामेडियन घर के दर्द को सीने में दबाकर अपनी बातों से जमाने को हंसाता है। मगर उसकी अचानक विदाई ने आंखें नम कर गई।

कुलवंत हैप्‍पी 

बुधवार, जुलाई 21, 2010

पिछले डेढ़ महीना-बिरह का महीना

पिछला डेढ़ महीना, मेरे लिए बिरह का महीना रहा। इस दौरान कितने ही लोग अचानक जिन्दगी से चले गए, कुछ सदा के लिए और कुछ फिर मिलने का वायदा कर। हमारी कंपनी आर्थिक तंगी की चपेट में उस वक्त आई, जब आर्थिक तंगी के शिकार देश वेंटीलेटर स्थिति से मुक्त हो चुके थे, कहूँ तो हमारी किश्तियों ने किनारों पर आकर जवाब दिया। जॉब जाने का कभी अफसोस नहीं हुआ, हां, लेकिन अगर अफसोस हुआ कुछ लोगों से जुदा होने का। जब भी जुदा होने का अफसोस अपनों से करने लगते तो अचानक किसी बुद्धजीवि की बात कहकर उस स्थिति को संभाल लिया जाता, अच्छे लोगों को एक जगह स्थाई नहीं होना चाहिए, पानी की तरह व रमते जोगियों की भांति चलते रहना चाहिए। ऐसी ढेरों बातें, जो जुदाई के गम को कम कर देती थी, एक दूसरे से हम दोस्त बोलते रहते थे। किसी ने कहा है, जमीनी फासले कितने भी क्यों न हों, बस दिलों में दूरियां नहीं होनी चाहिए। ऐसे हालातों में इंदौर छोड़ दिया, इंदौर छोड़ने का गम कम, खुशी ज्यादा थी, क्योंकि अपने शहर लौटना किसे अच्छा नहीं लगता। शाम ढले तो परिंदे भी घरों को लौट आते हैं, मैं तो फिर भी साढे तीन साल बाद अपने वतन लौट रहा था। इस डेढ़ महीने के दौरान मुझे पहला झटका उस दिन लगा, जिस दिन एक मित्र का सुबह सुबह फोन आया कि विशाल का छोटा भाई सड़क हादसे में घायल हो गया। इस सूचना ने मानो, प्राण ही निकाल लिए हों। सबसे पहले जुबां से वो ही शब्द निकले, जो किसी अपने के लिए निकलते हैं, हे भगवान मेरे सांसों से कुछ सांस ले, उसमें डाल दे। इंदौर शहर में अगर कोई दरियादिल इंसान मिला तो विशाल, अपने नाम की तरह विशाल। अगली सुबह दोस्त का फिर फोन आया, विशाल का भाई चल बसा। इतनी बात सुनने के बाद विशाल को फोन करने की हिम्मत नहीं थी, और मैंने किया भी नहीं, क्योंकि जब मैं ही भीतर से संभल नहीं पा रहा था, उसको क्या हिम्मत देता। मैंने अपने दोस्त को कहा कि तुम उसके पास जाओ और हिम्मत देना। किस्मत देखो, जनक को भी शाम की रेल गाड़ी से अपने घर लौटना था, वो भी जॉब छोड़ चुका था। मुझे और जनक को तो दुख इस बात का था कि विशाल का भाई चला गया, लेकिन विशाल की किस्मत देखो, वो इस महीने में मुझे, जनक, नितिन और न जाने कितने दोस्तों को अपने शहर से विदाई दे चुका था। सोमवार को विशाल का मेल मिला कि उसने ऑफिस ज्वॉइन कर लिया, यह मेरे थोड़ा सा राहतपूर्ण मेल था, क्योंकि ऑफिस का काम व दोस्तों का मिलवर्तन उसके दर्द को थोड़ा सा कम कर देंगे। मैंने पंजाब से गुजरात के लिए रवाना होते हुए रेलगाड़ी में उसको फोन किया, उसने बताया कि उसने किताब संन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेच दी को फिर से पढ़ना शुरू कर दिया, मैंने उसको बताया कि मैंने पिछले डेढ़ महीने में अच्छे दोस्तों की कमी न खले के चक्कर में चार किताबें पढ़ डाली, डेल कारनेगी की समुद्र तट पर पिआनो, ऑग मेंडिनो की विश्व का सबसे बड़ा चमत्कार, चौबीस घंटों में बदलें जिन्दगी पयॉलो क्योलो की अल्केमिस्ट, जिससे कुछ लोग कीमियागर के नाम से भी जानते हैं। रेल गाड़ी जैसे ही राजस्थान को क्रोस करते हुए गुजरात में इंटर होने लगी, तो मेरे मोबाइल पर संदेश आने लगे, यह संदेश नेटवर्क बदलने का अलर्ट नहीं थे, यह संदेश एक बेहद बुरी खबर लेकर आए थे। इनमें लिखा था, वेबदुनिया मराठी के पूर्व वरिष्ठ उप संपादक एक सड़क हादसे में चल बसे, पहले पहल तो खबर अविश्वासनीय लगी, लेकिन संदेशों के बाद कुछ मित्रों के फोन आए, जो इस बुरी खबर को सच होने की पुष्टि कर रहे थे। इस घटना में मुझे एक बार फिर से बेचैन कर दिया, आखिर हो क्या रहा है? जिन्दगी ने आखिर हम सबको किस तरह अलग थलग किया है। अभिनय कुलकर्णी, जिसे मैं जल्दबाजी में अभय कुलकर्णी कह जाता था, मेरी अंतिम मुलाकात तब हुई, जब मैं बेवदुनिया छोड़ने का फैसला कर चुका था, एक कांफ्रेंस रूम में। फैसला करने के बाद जैसे ही मैं वेबदुनिया के ऑफिस में पहुंचा तो सब मेरी प्रतिक्रिया जाने के लिए तैयार थे, आखिर क्या हुआ? क्यों कि इस बिरह के मौसम की शुरूआत मुझसे होने वाली थी। मैंने जैसे ही बताया कि मैं वेबदुनिया छोड़ने वाला हूँ, तो बात पूरे ऑफिस में जंगल की आग की तरह फैल गई। मेरे बाद शायद अभिनय कुलकर्णी को भी बुलाया जाना था, वो मेरा फैसला सुनने के बाद काफी बेचैन हो गए, होते भी क्यों न, आखिर पूरा परिवार जो इंदौर में बसा चुके थे, और कंपनी के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुके थे, कई अच्छे मौके उन्होंने अच्छे वक्त भी ठुकरा दिए थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी थी कि अब उन मौकों को आगे से जाकर मांगना था, जिनको ठुकरा चुके थे वो कई दफा। उसके दिन के बाद, मेरी और उनकी कोई बात नहीं हुई, लेकिन कल जैसे ही मुझे पता चला कि वो इस तरह दुनिया से चले गए, पांव तले से जमीन निकल गई। यह बेहद बुरी खबर थी मेरे लिए अब तक की, क्योंकि वेबदुनिया के क्षेत्रीय भाषा के जितने भी पोर्टल थे, उन पोर्टलों में सबसे बढ़िया वरिष्ठ उप संपादक थे, जिन्होंने लम्बे समय तक बिना किसी विवाद के अपना कार्यकाल खत्म किया, लेकिन वो इस तरह दुनिया से ही रुखस्त हो जाएंगे किसी ने नहीं सोचा था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।


शुक्रवार, अप्रैल 09, 2010

उस दिन का पागलपन

दो बजने में कुछ मिनट बाकी थे, और स्कूल की छुट्टी वाली घंटी बजने वाली थी, लेकिन हम दूसरे गाँव से पढ़ने आते थे, इसलिए हमारे लिए स्कूल की घंटी बजने से ज्यादा महत्वपूर्ण था बस का हॉर्न। उस दिन जैसे ही बस ने गाँव के दूसरे बस स्टॉप से हॉर्न दिया, तो हमारे गाँव के सब लड़के स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ दौड़ने लगे। मेरे गाँव के सब लड़के स्कूल की दीवार के उस पार खड़े मुझे आवाज दे रहे थे, ओए पंडता (पंडित) जल्दी आ, बस आने वाली है, लेकिन मैं और मेजर फँसे खड़े सौ के करीब लड़कों की भीड़ में। पंगा पड़ा हुआ था, एक लड़की को लेकर, जो इस स्कूल में पढ़ने के लिए आई थी, दूसरे किसी शहर से, लेकिन उसके शहरीपन ने स्कूल का माहौल बिगाड़ दिया, अब हर कोई प्यार इश्क की बातें करने लगा, लड़कियाँ लड़कों से फ्रेंडशिप करने के बारे में सोचने लगी। बस गलती इतनी सी थी मेजर की, वो दोस्त के कहने में आ गया और सोचने लगा वो लड़की उस पर मरती है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि मैं उससे स्पष्ट शब्दों में पूछ चुका था। सुंदर लड़की पर कौन नहीं मरना चाहेगा, पूरा स्कूल उसकी तरफ देखता था, मैं नहीं मेरी निगाहें कहीं और थी।

अब जैसे स्कूल में पता चला कि मेजर उस लड़की पर लाईन लगाता है, तो उस गाँव के सब लड़के सख्ते में आ गए। और उन्होंने मेजर को स्कूल में पीटने का प्लान बना लिया। मेरे सब दोस्तों को पहले पता चल गया था, वो सब के सब तो स्कूल के पिछले रास्ते से निकल बस स्टॉप पर पहुंचकर मुझे आवाज दे रहे थे, लेकिन मैं मेजर को स्कूल के बरामदों से बस स्टॉप की तरफ खींचकर ले जा रहा था, वो लड़कों की भीड़ देखकर घबरा रहा था, पैर पीछे खींच रहा था, लेकिन मेरा मन उसको अकेले छोड़ भाग जाने को नहीं करा, मैंने कहा मैं भी तो तेरे साथ चल रहा हूँ, तू क्यों डर रहा है, तुझे रोज इस स्कूल में आना है, अगर तू डरेगा तो ये लोग तुम्हें घर में घूसकर मारेंगे, तू डर मत मेरी बाजू पकड़, मैं देखता हूँ कौन रोकता है रास्ता।

सौ के करीब लड़कों की भीड़ मुख्य द्वार और बरामदे के बीच वाले रास्ते पर खड़ी थी, जैसे ही हमने कदम बरामदे से बाहर निकाले, वो सबके सब मारने के लिए अपने हाथ को तनने लगे, वो किसी भी समय हम पर हमला कर सकते थे, लेकिन मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ा, अब हम दोनों को लड़कों ने चारों ओर से घेर लिया था। एक लड़के ने मुट्ठी बंद कर जैसे ही मेरे गुप्तअंग की तरह प्रहार करने की कोशिश की, तो एक पीछे से आई आवाज ने उसकी मुट्ठी को वहाँ ही रोक दिया। "पंडतां दा मुंडा ए, देखके मारी" (पंडितों का लड़का है, देखकर मारना)। इस पंक्ति ने सबको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, और मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ता गया, और हम स्कूल के द्वार के बाहर निकल गए, कुछ देर में उधर से बस भी आ गई, हम दौड़कर बस की छत्त पर चढ़ गए। मेरे दोस्तों ने कहा, ओए पंडता तू बच गया, आज तेरे साथ बहुत बुरा होता, तुम्हें सन्नी देओल बनने की क्या जरूरत थी। इतना सुनते ही जब मैं उस दृश्य को ख्याल में देखा तो सच मानो, मेरे पैरों तले जमीं निकल गई, अगर कुछ हो जाता तो?

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

स्लैमबुक और उसकी मानसिकता

कुछ दिन पहले बठिंडा से मेरे घर अतिथि आए थे, वो मेरे खास अपने ही थे, लेकिन अतिथि इसलिए क्योंकि वो मुझे पहले सूचना दिए बगैर आए थे, और कमबख्त इस शहर में कौएं भी नहीं, जो अतिथि के आने का संदेश मुंढेर पर आकर सुना जाएं। वो आए भी, उस वक्त जब मैं बिस्तर में था, अगर खाना बना रहा होता तो शायद प्रांत (आटा गूँदने का बर्तन) में से आटा तिड़क कर बाहर गिर जाता तो पता चल जाता कोई आने को है।

रविवार, जनवरी 03, 2010

इम्तिहानों के दिन और फिल्म चस्का

बचपन गुजर चुका था, और हम किशोर अवस्था से युवास्था की तरफ दिन प्रति दिन कदम बढाते जा रहे थे। ये उन्हीं दिनों की बात है। हम सब दोस्त एक कमरे में बैठकर इम्तिहानों के दिनों में पढ़ाई करते थे। पढ़ाई तो बहाना होती थी सच पूछो तो मौज मस्ती करते थे। कभी दलजिंदर के चौबारे में तो कभी कलविंदर की बैठक में...रोज रात को पढ़ाई के बहाने महफिल जमती थी। वो जट्ट सिख परिवार से संबंध थे और उन सब के बीच मैं एक पंडितों के परिवार से होता था। हम हैं पंडित, लेकिन रहनी सहनी (जीवनशैली) बिल्कुल जट्टों जैसी है। जट्ट परिवार से संबंधित जितने भी दोस्त थे, वो पढ़ने लिखने में तो बिल्कुल नालायक.. उनके मन में एक बात घर कर चुकी थी कि जट्ट पुत्र तो खेतों के लिए बने हुए और उनको डिप्टी कमिश्नर तहसीलदार तो बनना नहीं। मेरा परिवार गरीब था, इसलिए मुझे किसी न किसी तरह पढ़ाई पूरी कर नौकरी हासिल करनी थी। इसलिए उन सब में सबसे ज्यादा नम्बर लाने वाला मैं ही होता था, वो सब के सब नक्लची।

शुक्रवार, जुलाई 31, 2009

एक आंसू गिरा उसकी आंख से....

वो ही रेलवे स्टेशन, वो ही रेलगाड़ी, पर कुछ बदलाव था इस बार। फर्क इतना था कि कभी इस गाड़ी से मैं आया था, और आज इस गाड़ी से कोई जा रहा था। जैसे परिंदे दाने चुगने के बाद अपने घरों की तरफ चल देते हैं, वैसे ही एक परिंदा आज यहां से उड़कर अपने घर जाने को तैयार था, बस देरी थी रेल गाड़ी छूटने की। सच में वो परिंदे नसीब वाले होते हैं, जिनको शाम ढले अपने बसेरे में पहुंचने को मिल जाता है, और कुछ बद-नसीब परिंदे जो बस उस दिन की बोट जोहते हैं, जिस दिन उनकी तकदीर बदले, और वो अपने वतन में, अपनों के बीच, अपनी जिन्दगी के कीमती लम्हे गुजारें। प्रवासी होने का गम बहुत बड़ा होता है, इसलिए इस बार दोस्त की विदाई के वक्त गम से ज्यादा खुशी थी कि वो अपने घर जा रहा है, अपनों के बीच। उन गलियों में, जिन गलियों को छोड़कर वो कभी इस जगह पहुंच गया था, जहां सिर्फ उसके पास नए दोस्त थे और कुछ अजनबी लोग। हम अप्रवासियों को भी अप्रवासियों का सहारा होता है, आज वो एक सहारा खत्म हो रहा था। रेलवे स्टेशन विदाई का वक्त, और सब ठहाके लगा रहे थे, शायद हँसी के तले गम छुपा रहे थे। गम तो होता ही जब को साथी चला जाए। वो भी हँसते हुए एसी कोच में चढ़ गई, गाड़ी वाले बाबू को क्या पता कि वो कितनों को बिछोड़कर लेकर जा रहा है और कितनों को अपनों से मिलाने के लिए। उसका तो काम है गाड़ी चलाना। गाड़ी अपने समय पर प्लेटफार्म से छूटी। वो हाथ हिलाते हुए दरवाजे से विदा ले रही थी, और रेलगाड़ी के साथ साथ हम से दूर जा रही थी, इतने में उसका हाथ उसका उसके चेहरे की तरह गया और फिर पीछे चला गया। इतने में वो आंखों से ओझल हो गई। मुझे नहीं पता, उसने हाथ नीचे की तरफ क्यों क्या किया, लेकिन
मुझे ऐसा लगा कि जो आंसू उसने दोस्तों के बीच खड़े होकर विदाई के वक्त छुपाए थे, उनमें से उसकी आंख से के मोती सा आंसू रेल की पट्ड़ी पर जा गिरा। अगर ये सच हुआ तो मैंने उसकी आंख से एक आंसू गिरते देखा, लेकिन उसने कितने आंसू रेलवे की सीट पर गिराए होंगे, ये मैं नहीं जानता। इस सवाल का जवाब वो खुद लिखेगी, जब वो इस ब्लॉग को पढ़ेगी। जब वो इंदौर में आई थी, तब मेरे लिए बिल्कुल आजकल थी, मगर जब वो इंदौर से गई तो इतनी खास हो गई कि अगर कभी खुदा ने मौत से पहले पूछा बोल तेरी आखिरी ख्वाहिश क्या है, तो जुबां पर आने वाले नामों में इस दोस्त का भी नाम होगा। पता नहीं, तब मुझे शायद ये मेरा दोस्त याद रखेगा, या अपनी जिन्दगी में मस्त होकर मुझे सदा के लिए भुला देगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैंने तो इस दोस्त को सदा याद करने के लिए अपने ब्लॉग पर छोड़ दी दे लिखत...जब जब कोई प्रतिक्रिया भेजेगा..तब तब इंदौर और इस दोस्त की याद ताजा होती रहेगी। वैसे याद तो उनको किया जाता है, जिनको कभी भूले हों...

रविवार, मई 31, 2009

एक कश ने बिगाड़ दिए


कहते हैं कि एक कदम हमको मंजिल तक पहुंचता है तो वहीं धुएं का एक कश बर्बादी की डगर पर खींच ले जाता है, आम लोगों की तरह मेरे भी दोस्त थे, उनके पास समय बहुत था, तो एक दिन मस्ती मस्ती में, मजाक मजाक में किसी के कहने पर धुएं का एक कश ले लिया, फिर तो क्या कश पर कश का सिलसिला चल पड़ा, लेकिन वो मेरे सामने नहीं पीते थे। मेरे एक दोस्त को तो मेरे पिता ने धूम्रपान करते हुए खेत में देख लिया, और उसके बोले कि आज के बाद हैप्पी के साथ नजर मत आना, वो बोला आज के बाद नहीं पिऊंगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो तो वहां से बचने का बहाना था, उसके बाद उनको सिग्रेट बीड़ी में भंग के पौधे से उतरा हुआ माल भरकर पीने की आदत पड़ गई। वो धूम्रपान का आदी हो चुका है, मुझे तब पता चला, जब उसका गुलाब से चेहरे पर छाइयां पड़ना शुरू हो गई। मैं अन्य दोस्त भी धूम्रपान के आदी है, इसबात का पता तब चला, जब मैं एक बार शहर से गांव गया था, और सुभाविक था कि मैं उनसे मिलने जाऊं, रात हुई तो मैं भी उनके साथ बस स्टैंड की तरफ टहलने निकल गया, वो मुझे किसे बहाने पीछे छोड़कर जाना चाहते थे, लेकिन मैं उनके कदमों से कदम मिलाता चल गया। वो दुकान पर पहुंचे, तो दुकानदार ने फटाक से सिग्रेट निकालकर दे दी, उनके बिन बोले, क्योंकि उसको पता था कि ये टोली सिग्रेट पीने आती है। उन्होंने ने पहले तो इंकार किया, लेकिन पीछे से आवाज आई रोज तो पीते हैं, आज हैप्पी के सामने भी पी लें। एक की तो कश ने जान भी ले ली, वो मेरे साथ कबड्डी खेला करता था, लेकिन उसके मां बाप ने उसको अच्छी पढ़ाई के लिए मंडी के बड़े स्कूल में भेजना शुरू कर दिया, जहां पर उसको सिग्रेट पीने की आदत हो गई। धीरे धीरे सिग्रेट में नशीले पदार्थ मिलाकर पीने की आदत पड़ गई। वो मेरा हम उम्र था, उसकी शादी कुछ साल पहले हुई थी और वो शादी के एक साल बाद भरी जवानी में इस दुनिया को छोड़कर रुखस्त हो गया।

गुरुवार, मार्च 19, 2009

जब यारों के लिए लिखे प्रेम पत्र

वो दिन बहुत याद आते हैं, जब हम सब दोस्त मिलकर एक घर में एकत्र होते थे और पढ़ा करते थे, पढ़ने वाले तो दो ही थे, बाकी तो मौज मस्ती करने के लिए आते थे. शाम को रोटी खाने के बाद दूध पीकर घर से पढ़ाई का बहाना बनाकर जल्दी भागना मुझे याद है, हम सब मेरे एक दोस्त के यहां एकत्र होते थे, उनके बाहर वाले घर में जहां पर होती थी बस हमारी मनचलों की टोली. हंसना, बातें सुनाना और कभी कभार गंभीरता से पढ़ना हमारी रातचर्या में शामिल था.
उस घर में पहले मैं और मेरा एक अन्य दोस्त पढ़ते थे, जो जट्ट सिख परिवार से संबंध रखता था, धीरे धीरे हमारे एक साथ पढ़ने के बात मेरे अन्य दोस्तों तक पहुंच गई, और उन्होंने भी वहां पर आना शुरू कर दिया. उनको घर से मंजूरी मेरे नाम के चलते मिल गई, क्योंकि मेरे दोस्तों के अभिभावक जानते थे कि हैप्पी ( लेकिन उनके अभिभावक मुझे पंडितों का लड़का कहकर ही संबोधन करते थे) पढ़ने लिखने में तेज है. सच कहता हूं, जब तक हम दो थे तो ठीक था, लेकिन जब हमारी संख्या बढ़ते बढ़ते पांच छ: हो गई, तब मौज मस्ती ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया. हम सबने 9वीं कक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली, नतीजियों ने मां-बाप का विश्वास बढ़ा दिया कि बच्चे एक साथ पढ़ते हैं तो अच्छे नंबर लेकर आते हैं, लेकिन वो हमारी मौज मस्ती से अनजान थे.
दसवीं कक्षा में होते ही, एकदम से सब को प्रेम का कीड़ा काटना शुरू हो गया, एक लड़की हमारे स्कूल में एक शहर से आई थी, जो बहुत ज्यादा शहरी किस्म की थी, वो जिस शहर से आई थी, वहां ज्यादातर लोग पढ़े लिखे थे, ज्यादा शहरी थे. लेकिन अब वो गांव में आ गई थी, मगर वारिस शाह के कहने अनुसार आदतें कभी नहीं जाती, आदमी मर जाता है, उस लड़की ने आते ही कक्षा में लड़कों से दोस्ती रखने के परंपरा शुरू की, उसने अपने ढंग से सब लड़कियों के दिल की बात जानने के लिए वोटिंग रख दी, वो देखना चाहती थी कि कौन सी लड़की किस लड़के को पसंद करती है. लड़कियों में ऐसा हुआ है, ये बात मेरे दोस्त की गर्लफ्रैंड के मार्फत हम तक पहुंच गई, जो कई लड़कों की गर्लफ्रैंड रह चुकी थी.
शहरी लड़की के पीछे सब दीवाने थे, मुझे छोड़कर, सच है,, कसम से बिल्कुल सच, क्योंकि वो उस तरह की लड़की नहीं थी, जो मुझे पसंद आए या मेरी रातों की नींद चुरा ले. अब उसको पटाने के लिए लड़कों में होड़ सी लगी थी, सब एक दूसरे से सुंदर बनाकर आने लगे, ऐसे में हम सब दोस्तों ने मिलकर एक लड़के को कहा कि वो उससे प्यार करती है, पहले तो उसको यकीन नहीं हुआ, लेकिन एक दिन आधी छुट्टी वाले दिन किसी काम से वो लड़की उस लड़के के पास आई. बस फिर क्या था, हमने उसको अहसास करवाया कि वो उससे प्यार करती है, लेकिन मुझे पता था कि वो किसी और लड़के को पसंद करती है, क्योंकि उस लड़के के दोस्त मेरे साथ कबड्डी खेलते थे.
अब उस महोदय को बात सच लगने लगी, उसने कहा हैप्पी तुम मेरे दोस्त हो, मैंने बेशक, तो उसने कहा के मेरे लिए एक प्रेम पत्र लिखो, मैं उसको देना चाहता हूं. जैसा तैसा आता था, मैंने लिखकर उसको थमा दिया. लेकिन वो तीन दिन तक जेब में पाकर इधर उधर घूमता रहा, एक दिन मैंने कहा, चल यार मैं ही तेरी बात करवा देता हूं, क्योंकि लड़कियों में मेरी इमेज कुछ अच्छी थी, क्योंकि मैं एक दो प्यार प्रस्ताव ठुकरा चुका था. एक तो नौवीं कक्षा में और एक इन पलों से कुछ दिन पहले, मैंने आधी छुट्टी के वक्त उसको बुलाया, वो मेरे पास आई, तो मैंने कहा ये आपसे कुछ बात कहना चाहता है, वो बिंदास बोली बोलो (उसका नाम लेकर)...वो बेचारा पसीनों पसीनी हो गया, और बोला कुछ नहीं, वो ऐसे ही मेरी तरफ देखकर चली गई. उसके बाद मेरे दो और दोस्तों ने रात को प्रेम पत्र लिखवाए, एक महोदय का प्रेम पत्र तो कपड़ों की धुलाई के साथ ही धुल गया.
दरअसल, उसने मुझे प्रेम पत्र लिखाकर अपनी पेंट में डाल दिया, ताकि मौका मिलते ही उसको थमा देगा, लेकिन गांव में प्यार का शब्द कहते ही जुबां होंठ एवं पूरा शरीर थर्राता है, तो प्रेम पत्र कोई कैसे ऐसे पकड़ा देता..कुछ दिन वो प्रेम पत्र लेकर जेब में घूमता रहा और एक दिन पेंट में घर भूल गया और मां ने कपड़ों के साथ उसको धो दिया. इसके अलावा अन्य दोस्तों के लिए भी मैंने प्रेम पत्र लिखे, लेकिन किसी में दम नहीं था कि वो आगे पहुंचा सके, और मैं खुद के लिए लिखता नहीं था, क्योंकि घर की स्थिति और बापू की लठ अक्सर मुझे रोक देती थी. वैसे दिल लुटाने वालों की कमी न थी. आगे बताऊंगा...तब तक के लिए अलविदा...