रविवार, अगस्त 16, 2009

तोतली जुबान से जब पिता को टोका

रात का समय था और हमारे घर मेरे पिता श्री अपने एक अन्य दोस्त के साथ बैठकर शराब का लुत्फ उठा रहे थे. मैं दूर खड़ा इस दृश्य को बड़ी गौर से देख रहा था, पता नहीं मुझे क्या हुआ, मैं उनके पास गया और बोला, अंकल जी अगर आप ने शराब पीनी है तो हमारे घर में मत आया करो.

मेरे शब्द सुनते ही मेरे पिता एवं अंकल जी दंग रह गए, उन्होंने इधर उधर देखा, शायद वो सोच रहे थे कि मुझे यह बात कहने के लिए मेरी मम्मी ने भेजा है. अभी वो इधर उधर देख ही रहे थे कि इतने में मेरी मम्मी पड़ोस में रहने वाली मेरी भाभी के घर से आई. जैसे अंकलजी ने देखा कि मेरी मम्मी बाहर आ रही हैं तो वो हंसते हुए बोले अगर भाभी जी आप बाहर न होते तो मुझे लगता कि आप ने इसको समझाकर मेरे पास भेजा होगा.

मेरे अंकलजी ने मुझे गोद में बिठाया और बोले ठीक है सरपंच आज के बाद घर से बाहर पिया करेंगे. इसके बाद मेरे पिता जी ने मेरी तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए. मेरे पिता जी शराब पीकर अकसर मेरी तारीफ किया करते थे. मेरे पिता को मेरी याददाश्त पर बहुत गर्व था क्योंकि मुझे घर की हर चीज एवं हर बात याद रहती थी जो कि कभी कभी मेरे पिता को हैरत में डाल देती थी. जब उक्त घटना घटित हुई तब शायद मेरे चार वर्ष का था.

शुक्रवार, जुलाई 31, 2009

एक आंसू गिरा उसकी आंख से....

वो ही रेलवे स्टेशन, वो ही रेलगाड़ी, पर कुछ बदलाव था इस बार। फर्क इतना था कि कभी इस गाड़ी से मैं आया था, और आज इस गाड़ी से कोई जा रहा था। जैसे परिंदे दाने चुगने के बाद अपने घरों की तरफ चल देते हैं, वैसे ही एक परिंदा आज यहां से उड़कर अपने घर जाने को तैयार था, बस देरी थी रेल गाड़ी छूटने की। सच में वो परिंदे नसीब वाले होते हैं, जिनको शाम ढले अपने बसेरे में पहुंचने को मिल जाता है, और कुछ बद-नसीब परिंदे जो बस उस दिन की बोट जोहते हैं, जिस दिन उनकी तकदीर बदले, और वो अपने वतन में, अपनों के बीच, अपनी जिन्दगी के कीमती लम्हे गुजारें। प्रवासी होने का गम बहुत बड़ा होता है, इसलिए इस बार दोस्त की विदाई के वक्त गम से ज्यादा खुशी थी कि वो अपने घर जा रहा है, अपनों के बीच। उन गलियों में, जिन गलियों को छोड़कर वो कभी इस जगह पहुंच गया था, जहां सिर्फ उसके पास नए दोस्त थे और कुछ अजनबी लोग। हम अप्रवासियों को भी अप्रवासियों का सहारा होता है, आज वो एक सहारा खत्म हो रहा था। रेलवे स्टेशन विदाई का वक्त, और सब ठहाके लगा रहे थे, शायद हँसी के तले गम छुपा रहे थे। गम तो होता ही जब को साथी चला जाए। वो भी हँसते हुए एसी कोच में चढ़ गई, गाड़ी वाले बाबू को क्या पता कि वो कितनों को बिछोड़कर लेकर जा रहा है और कितनों को अपनों से मिलाने के लिए। उसका तो काम है गाड़ी चलाना। गाड़ी अपने समय पर प्लेटफार्म से छूटी। वो हाथ हिलाते हुए दरवाजे से विदा ले रही थी, और रेलगाड़ी के साथ साथ हम से दूर जा रही थी, इतने में उसका हाथ उसका उसके चेहरे की तरह गया और फिर पीछे चला गया। इतने में वो आंखों से ओझल हो गई। मुझे नहीं पता, उसने हाथ नीचे की तरफ क्यों क्या किया, लेकिन
मुझे ऐसा लगा कि जो आंसू उसने दोस्तों के बीच खड़े होकर विदाई के वक्त छुपाए थे, उनमें से उसकी आंख से के मोती सा आंसू रेल की पट्ड़ी पर जा गिरा। अगर ये सच हुआ तो मैंने उसकी आंख से एक आंसू गिरते देखा, लेकिन उसने कितने आंसू रेलवे की सीट पर गिराए होंगे, ये मैं नहीं जानता। इस सवाल का जवाब वो खुद लिखेगी, जब वो इस ब्लॉग को पढ़ेगी। जब वो इंदौर में आई थी, तब मेरे लिए बिल्कुल आजकल थी, मगर जब वो इंदौर से गई तो इतनी खास हो गई कि अगर कभी खुदा ने मौत से पहले पूछा बोल तेरी आखिरी ख्वाहिश क्या है, तो जुबां पर आने वाले नामों में इस दोस्त का भी नाम होगा। पता नहीं, तब मुझे शायद ये मेरा दोस्त याद रखेगा, या अपनी जिन्दगी में मस्त होकर मुझे सदा के लिए भुला देगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैंने तो इस दोस्त को सदा याद करने के लिए अपने ब्लॉग पर छोड़ दी दे लिखत...जब जब कोई प्रतिक्रिया भेजेगा..तब तब इंदौर और इस दोस्त की याद ताजा होती रहेगी। वैसे याद तो उनको किया जाता है, जिनको कभी भूले हों...

रविवार, जून 21, 2009

माँ छांव तो बाप कड़ी धूप

जब भी पिता ने हमको मारने की कोशिश की, मां बीच में दीवार बन खड़ी हो गई। हमारे तन पर पड़ने वाली लठें उसने अपने तन पर सही। हमारे बचाव में जब भी मां उतरती तो पिता के मुँह पर एक बात होती थी कि 'माँ बिगाड़ती है और पिता संवारता था'। पिता के इन शब्दों से मैं कुछ हद तक सहमत हूं, अगर सिर पर पिता के डर का साया न हो तो शायद बच्चे उतनी सीमा में नहीं रहते जितनी में रहना चाहिए। मुझे लगता है कि माँ हमारे अनुकूल बनती है, जबकि पिता हमको समाज के अनुकूल बनता था। माँ हमारी हर गलती को छुपाती है, लेकिन पिता उन गलतियों को छापने के बजाय उन गलतियों को दोहराने से रोकता है। मुझसे पता है कि मेरे पिता का स्वभाव बहुत गर्म था, जो अब उतना नहीं। लेकिन माँ स्वभाव में बिल्कुल इसके विपरीत थी। हम पिता से इतना डरते थे कि अगर वो आते दिख जाते तो हम खेलना छोड़कर घर के भीतर चले जाते। ये भी उनके भय के कारण ही हुआ, जो हम बुरी संगत से दूर रहें, स्कूल से कोई शिकायत लेकर घर नहीं आए। किसी लड़की के पीछे नहीं गए, किसी को सीटी बजाकर छेड़ा नहीं। जब ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को टीचर पीटते हैं तो वो शिकायत लेकर घर नहीं आते, अगर आते हैं तो सिर्फ माँ को बताते हैं, क्योंकि उनको पता होता है कि पिता को बताया तो वो सीधा स्कूल जाएंगे, इस लिए नहीं कि टीचर ने उनकए बच्चे को क्यों पीटा, बल्कि इस लिए जाएंगे कि आपने इसको और अच्छे से क्यों नहीं पीटा। अगर पिता को दूसरे नजरिए से देखें तो कहूंगा कि अगर माँ प्यार का सागर है तो पिता क्रेडिट कार्ड है। जिसके बल पर ऐश करने का अपना ही मजा है। जब हम सब पुत्र होते हैं तो हमको बाप की डाँट फटकार बुरी लगती है और माँ का दुलार भाता है। मगर जब हम अपने पिता वाली जॉब पर आते हैं तो हम वो ही करते हैं, जो हमारे पिता करते थे। अपने बच्चे की गलतियों को सुधारना और उनको फिर से न दोहराने के सीख देना आदि। तब जब हमारी पत्नियाँ हमारी माँ वाली ड्यूटी निभाती हैं तो हमको बुरा लगता है। जिन्दगी में जितनी माँ की अहमियत है, उतनी ही पिता की। हमारा माँ से लगाव इस लिए ज्यादा रहता है क्योंकि वो हमारी गलतियों को माफ करती है, वो हमारे अनुकूल रहती है। जबकि असल में पिता खून पसीने की कमाई से हमें सफल इंसान बनाने के लिए दिन रात काम करता है, ये काम ही हमको उनके अधिक करीब नहीं आने देता। लेकिन सत्य तो ये है कि अगर माँ छांव है तो पिता एक कड़ी धूप, जो हमको हर स्थिति का सामना करने के लिए हमको कठोर बनाता है।